ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
उस प्राण स्वरुप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

Saturday, 19 January 2013

नम्रता, सरलता, साधुता, सहिष्णुता

सहिष्णुता का अभ्यास करो। अपने उत्तरदायित्वों को समझो। किसी के दोषों को देखने और उन पर टीका-टिपण्णी करने के पहले अपने बड़े-बड़े दोषों का अन्वेषण करो। यदि अपनी वाणी का नियंत्रण नहीं कर सकते तो उसे दूसरों के प्रतिकूल नहीं बल्कि अपने प्रतिकूल उपदेश करने दो।

सबसे पहले अपने घर को नियमित बनाओ क्योंकि बिना आचरण के आत्मानुभव नहीं हो सकता। नम्रता, सरलता, साधुता, सहिष्णुता ये सब आत्मानुभव के प्रधान अंग हैं।

दूसरे तुम्हारे साथ क्या करते हैं इसकी चिंता न करो। आत्मोन्नति में तत्पर रहो। यदि यह तथ्य समझ लिया तो एक बड़े रहस्य को पा लिया।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 10 से उधृत

Friday, 18 January 2013

अपने आपकी समालोचना करो

 जो कुछ हो, होने दो। तुम्हारे बारे में जो कहा जाए उसे कहने दो। तुम्हें ये सब बातें मृगतृष्णा के जल के समान असार लगनी चाहिए। यदि तुमने संसार का सच्चा त्याग किया है तो इन बातों से तुम्हें कैसे कष्ट पहुँच सकता है। अपने आपकी समालोचना में कुछ भी कसार मत रखना तभी वास्तविक उन्नति होगी।

प्रत्येक क्षण और अवसर का लाभ उठाओ। मार्ग लम्बा है। समय वेग से निकला जा रहा है। अपने संपूर्ण आत्मबल के साथ कार्य में लग जाओ, लक्ष्य तक पहुंचोगे।

किसी बात के लिए भी अपने को क्षुब्ध न करो। मनुष्य में नहीं ईश्वर में विशवास करो। वह तुम्हें रास्ता दिखायेगा और सन्मार्ग सुझाएगा।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 9 से उधृत

Thursday, 17 January 2013

मार्गदर्शन के लिए अपनी ही ओर देखो

साक्षात्कार संपन्न पुरुष न तो दूसरों को दोष लगता है और न अपने को अधिक शक्तिमान वस्तुओं से आच्छादित होने के कारण वह स्थितियों की अवहेलना करता है।

अहंकार से उतना ही सावधान रहो जितना एक पागल कुत्ते से। जैसे तुम विष या विषधर सर्प को नहीं छूते, उसी प्रकार सिद्धियों से अलग रहो और उन लोगों से भी जो इनका प्रतिवाद करते हैं। अपने मन और हृदय की संपूर्ण क्रियाओं को ईश्वर की और संचारित करो।

दूसरों का विश्वास तुम्हें अधिकाधिक असहाय और दुखी बनाएगा। मार्गदर्शन के लिए अपनी ही ओर देखो, दूसरों की ओर नहीं। तुम्हारी सत्यता तुम्हें दृढ़ बनाएगी। तुम्हारी दृढ़ता तुम्हें लक्ष्य तक ले जाएगी।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 8 से उधृत

Wednesday, 16 January 2013

आत्म समर्पण करो

 तुम्हें यह सीखना होगा कि इस संसार में कुछ कठिनाईयाँ हैं जो तम्हे सहन करनी हैं। वे पूर्व कर्मों के फलस्वरूप तुम्हें अजेय प्रतीत होती हैं। जहाँ कहीं भी कार्य में घबराहट थकावट और निराशाएँ हैं, वहां अत्यंत प्रबल शक्ति भी है। अपना कार्य कर चुकने पर एक और खड़े होओ। कर्म के फल को समय की धारा में प्रवाहित हो जाने दो।

अपनी शक्ति भर कार्य करो और तब अपना आत्मसमर्पण करो। किन्हीं भी घटनाओं में हतोत्साहित न होओ। तुम्हारा अपने ही कर्मों पर अधिकार हो सकता है। दूसरों के कर्मों पर नहीं। आलोचना न करो, आशा न करो भय न करो, सब अच्छा ही होगा। अनुभव आता है और जाता है। खिन्न न होओ। तुम दृढ़ भित्ति पर खड़े हुए हो।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 7 से उधृत 

Tuesday, 15 January 2013

हँसते रहो, मुस्कुराते रहो

उठो! जागो! रुको मत!!! जब तक की लक्ष्य प्राप्त न हो जाये। कोई दूसरा हमारे प्रति बुराई करे या निंदा करे, उद्वेगजनक बात कहे तो उसको सहन करने और उसे उत्तर न देने से बैर आगे नहीं बढ़ता। अपने ही मन में कह लेना चाहिए कि इसका सबसे अच्छा उत्तर है मौन। जो अपने कर्तव्य कार्य में जुटा रहता है और दूसरों के अवगुणों की खोज में नहीं रहता उसे आतंरिक प्रसन्नता रहती है।

जीवन में उतार-चढाव आते ही रहते हैं।

हँसते रहो, मुस्कुराते रहो।

ऐसा मुख किस काम का जो हँसे नहीं मुस्कुराए नहीं।

जो व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति स्थिर रखना चाहता हैं, उनको दूसरों की आलोचनाओं से चिढना नहीं चाहिए।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 6 से उधृत

Monday, 14 January 2013

जीवन को यज्ञमय बनाओ

 मन में सबके लिए सद्भावनाएँ रखना, संयमपूर्ण सच्चरित्रता के साथ समय व्यतीत करना, दूसरों की भलाई बन सके उसके लिए प्रयत्नशील रहना, वाणी को केवल सत्प्रयोजनों के लिए ही बोलना, न्यायपूर्ण कमी पर ही गुजर करना, भगवान् का स्मरण करते रहना, अपने कर्तव्य पथ पर आरूढ़ रहना, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित न होना-यही नियम हैं जिनका पालन करने से जीवन यज्ञमय हो जाता है। मनुष्य जीवन को सफल बना लेना ही सच्ची दूरदर्शिता और बुद्धिमता है।

जब तक हम में अहंकार की भावना रहेगी तब तक त्याग की भावना का उदय होना कठिन है।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ट 5 से उधृत 

Sunday, 13 January 2013

अंतरात्मा का सहारा पकड़ो

यदि तुम शांति, सामर्थ्य और शक्ति चाहते हो तो अपनी अंतरात्मा का सहारा पकड़ो। तुम सारे संसार को धोखा दे सकते हो किन्तु अपनी आत्मा को कौन धोखा दे सका है। यदि प्रत्येक कार्य में आप अंतरात्मा की सम्मति प्राप्त कर लिया करेंगे तो विवेक पथ नष्ट न होगा. दुनिया भर का विरोध करने पर भी यदि आप अपनी अंतरात्मा का पालन कर सके तो कोई आपको सफलता प्राप्त करने से नहीं रोक सकता।

जब कोई मनुष्य अपने आपको अद्वितीय व्यक्ति समझने लगता है और अपने आपको चरित्र में सबसे श्रेष्ठ मानने लगता है, तब उसका आध्यात्मिक पतन होता है।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 4 से उधृत