ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
उस प्राण स्वरुप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

Monday, 11 February 2013

जप प्रक्रिया का ज्ञान-विज्ञान

जप में शब्दों की पुनरावृत्ति होते रहने से उच्चारण का एक चक्रव्यूह-सर्किल बनता है। क्रमिक परिभ्रमण से शक्ति उत्पन्न होती है। क्रमिक परिभ्रमण से शक्ति उत्पन्न होती है। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। उस परिभ्रमण से आकर्षण शक्ति तथा त्रिलोक में सन्निहित अनेक स्तर की क्षमताएँ उत्पन्न होती है। यदि पृथ्वी का परिभ्रमण बन्द हो जाय तो उस पर घोर नीरवता, निर्जीवता एवं अशक्तता छाएगी। शक्ति उत्पादन के लिए परिभ्रमण कितना आवश्यक है इसे डाइनेमो के प्रयोगकर्ता जानते हैं। घुमाव बन्द होते ही बिजली बनना बन्द हो जाती है। स्थूल और सूक्ष्म शरीर में विशिष्ट स्तर के विद्युत प्रवाह उत्पन्न करने के लिए विशिष्ट शब्दों का विशिष्ट गति एवं विधि से उच्चारण करना पड़ता है। मन्त्र जप का सामान्य विज्ञान यही है। जप में एक शब्दावली को एक क्रम और एक गति से बिना विराम दिये गतिशील रखा जाता है। साधारण वार्तालाप में अनेकों शब्द अनेक अभिव्यक्तियाँ लिये हुए अनेक रस और भावों सहित उच्चारित होते है। वस्तुतः इनमें न तो एक रूपता होती है न एक गति। कभी विराम, कभी प्रवाह, कभी आवेश व्यक्त होते रहते हैं, पारस्परिक वार्तालाप में प्रतिपादन का एक केन्द्र या एक स्तर नहीं होता। अतएव उससे वार्ता-जन्य प्रभाव भर उत्पन्न होता है, कोई विशिष्ट शक्तिधारा प्रवाहित नहीं होती। जप की स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। सीमित शब्दावली ही प्रयुक्त होती है और वही लगातार बोली जाती रहती है। रेखागणित के विद्यार्थी जानते हैं कि एक रेखा यदि लगातार सीधी खींची जाती रहे तो वह अन्ततः उसी केन्द्र से आकर जुड़ जायगी, जहाँ से आरम्भ हुई थी। प्रत्येक गतिशील पदार्थ गोल हो जाता है। पृथ्वी गोल है। ग्रह-नक्षत्र सभी गोल है। भौतिक जगत का छोटा घटक परमाणु और चेतन जगत का छोटा घटक जीवाणु दोनों ही गोल हे। गोलाई पर चलते रहा जाय तो उसका अनत आरम्भ वाले स्थान पर ही होगा। ग्रह-नक्षत्रों की भ्रमण कक्षाएँ इसी आधार पर सुनिश्चित रहती है। सीधी रेखा में हम पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल पड़े तो लौटकर वहीं आ जायेंगे, जहाँ से चले थे। इस सिद्धान्त के अनुसार मन्त्र-जप की परिणति एक गतिशील शब्द चक्र की स्थापना के रूप में होती है। कहा जाता है कि वाल्मीकि ऋषि ने उलटा मन्त्र जपा था अर्थात् राम-राम के स्थान पर मरा-मरा कहा था। वस्तुतः यह सुनने-समझने वालों का ही भ्रम रहा होगा। लगातार एक ही गति-क्रम से राम-राम कहते रहने पर उसकी गति गोल हो जायगी और उसे आसानी से मरा-मरा समझा जा सकेगा। इसी प्रकार मरा-मरा मन्त्र का संकल्प लेकर किया गया उच्चारण भी राम-राम प्रतीत होने लगेगा। असल में होता यह है कि एक शब्दावली को अनवरत गति से बोलने पर उसमें आदि अनत का भेद नहीं रहता पूरी शब्दावली एक गोलाई में घूमने लगती है और शब्द-चक्र बनाती है। मन्त्र जप के विधान का निर्देश करते हुए ‘तैलधार वत्’ सूत्र में कहा गया है कि जिस तरह तेल को एक गति से गिराने पर इसकी धारा बँध जाती है, उसी प्रकार मन्त्रोच्चारण का क्रम एक ही गति से चलाना चाहिए। न उसके प्रवाह क्रम में अन्तर आवे और न उच्चारण स्तर में। रुक-रुककर कभी धीमे, कभी तीव्र, कभी उच्चस्वर, कभी मन्द ऐसा जप में नहीं हो सकता वेदमन्त्रों के सस्वर उच्चारण की बात दूसरी है। वे छन्द है इसलिए पाठ करते समय उन्हें स्वरबद्ध अनुशासन का ध्यान रखते हुए गाया जाना अथवा पाठ करना उचित है। जप की व्यवस्था इससे सर्वथा भिन्न है। गायत्री, मृत्युञ्जय आदि वेद मन्त्रों को भी जप करते समय स्वर रहित ही जपा जाता है, साथ ही धारा जैसी एक रस-एक सम गति बनाये रखी जाती है। इनमें कोई अंतर तो नहीं पड़ता इसकी जाँच-पड़ताल माला के आधार पर गई गणना से होती है। गायत्री मन्त्र जप में साधारणतया एक घण्टे में 10-11 माला होती है। नित्य वही क्रम चला या नहीं, इसकी जाँच-पड़ताल घड़ी और माला के समन्वय से हो सकती है। प्रत्येक माला पूरी होने में समान समय लगना चाहिए सभी मन्त्र शक्ति का वैज्ञानिक आधार बन गया ऐसा समझा जा सकता है। भक्ति-विभोर होकर बिना गति का ध्यान रखे भी जप हो सकता है, पर वह भावनात्मक प्रक्रिया हुई उसका परिणाम भावना की शुद्धता और गहराई पर निर्भर है। ऐसे जप को शब्द-शक्ति के आधार पर उत्पन्न होने वाले मन्त्र-जप से भिन्न स्तर का समझा जाना चाहिए। ब्लडप्रेशर नापने की मशीन रोगी की बाँह पर बाँधकर डाक्टर घड़ी पर निगाह लगाये रहते हैं, हवा का दबाव बढ़ाते रहते हैं, कान में स्टेथस्कोप से धड़कन गिनते रहते हैं, तभी वे समझ पाते हैं कि रक्त-चाप कितना है। घड़ी और माला-गणना पर ध्यान लगाये रहकर नये साधक को अपने अप की गति को एक रस एक सम बनाना पड़ता है। उतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि शब्द गति का चक्र बन गया और उसके आधार पर मन्त्र विज्ञान के विशिष्ट परिणाम उत्पन्न होंगे। विशेष पुरश्चरणों में जप विद्या के निष्णात साधक इसीलिए बिठाये जाते हैं कि उनकी सही जप-प्रक्रिया सही परिणाम उत्पन्न कर सके। गति जब गोलाई में घूमने लगती हैं तो उससे उत्पन्न होने वाले चमत्कार हम अपने दैनिक जीवन में नित्य ही देखते रहते है। बच्चे छोटी 'फिरकनी' अथवा लट्टू जमीन पर घुमाने का खेल-खेलते हैं। एकबार होशियारी से घुमा देने पर यह खिलौने देर तक अपनी धुरी पर घूमते रहते हैं और गिरते नहीं। जबकि गति बन्द होते ही वे जमीन पर गिर जाते है। यह गति का चमत्कार ही है कि एक बार का धक्का देर तक काम देता है और उत्पन्न गति प्रवाह को देर तक चलते रहने की स्थिति उत्पन्न करता है। जप के द्वारा उत्पन्न गति भी साधना काल के बहुत पश्चात् तक चलती रहती है और साधक की आत्मिक विशेषता को गतिशील एवं सुस्थिर बनाये रहती है। मशीनों का बड़ा पहिया 'फ्लाइव्हील' एक बार घुमा देने पर मशीन के अन्य पुर्जों को न केवल गतिशील ही करता है, वरन् उनकी चाल को नियन्त्रित भी करता है। आरी का उपयोग हाथ से आगे पीछे की गति से करने पर भी लकड़ी कटती है, पर यदि गोलाई में घुमा दिया जाय तो वही आरी कई गुनी शक्तिशाली सिद्ध होगी और अधिक मात्रा में-अधिक जल्दी कटाई कर सकेगी। आरा मशीनें यही करती हैं। वे मोटे-मोटे लट्ठे और कठोर जड़े आसानी से चीर-चार कर रख देती हे जबकि आगे पीछे करने पर उसी आरी के लिए वहीं लकड़ी काटना काफी कठिन पड़ता । यह सब गोलाई में घूमने वाले गति प्रवाह का चमत्कार है। तेजी के साथ गोलाई का घुमाव ‘सैन्ट्रीफ्यूगल फोर्स” उत्पन्न करता है। गोफन में कंकड़ रखकर घुमाने और उसे छोड़कर पक्षी भगाने का कार्य पकी फसल रखने के लिए किसानों को बहुधा करना पड़ता हैं। घुमाव की शक्ति के यह आश्चर्यचकित करने वाले परिणाम साधारणतया देखने में आते रहते हैं। ज पके माध्यम से गतिशील शब्द शक्ति का प्रतिफल भी वैसा ही होता है। झूले पर बैठे बच्चों को जिस तरह अधिक बड़े दायरे में तेजी से घूमने का और गिरने की आशंका होने पर भी न गिरने का आनन्द मिलता है, उसी प्रकार अन्तः चेतना की सीमा परिधि छोटी सीमा से बढ़कर कहीं अधिक व्यापक क्षेत्र तक अपना विस्तार देखती है और दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों के कारण अधःपतन की जो आशंका रहती है, उसके बचाव की सहज सम्भावना बन जाती है। गोफन द्वारा फेंके गये कंकण की तरह साधक अभीष्ट लक्ष्य की ओर द्रुतगति से दौड़ता है और यदि फेंकने वाले के हाथ सधे हुए है तो वह ठीक निशाने पर भी जा लगता है। घुमाव की स्थिति में रहने पर तिरछा हो जाने पर भी लोटे का पानी नहीं फैलता। उसी प्रकार अपने भीतर भरे जीवन तत्व के, संसार के अवांछनीय आकर्षणों में गिर पड़ने का संकट घट जाता है। लोटा धीमे घुमाया गया हो तो बात दूसरी है, पर तेजी से घुमाव पानी को नहीं ही गिरने देता। ज पके साथ जुड़ा विधान और भावना स्तर यदि सही हो तो आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों से आये दिन जूझने ओर कदम-कदम पर असफल होने की कठिनाई दूर हो जाती है। चेतना को प्रशिक्षित करने के लिए मनोविज्ञान में चार आधार और स्तर बताये गये हैं। इनमें प्रथम है शिक्षण-जिसे अँगरेजी में 'लर्निंग' कहते है। स्कूल के बच्चों को इसी स्तर पर पढ़ाया जाता है। उन्हें तरह-तरह की जानकारियाँ दी जाती है। उन जानकारियों को सुन लेने भर से काम नहीं चलता विद्यार्थी उन्हें बार-बार दुहराते हैं। स्कूली पढ़ाई का सारा क्रम ही दुहराते-याद करने के सहारे खड़ा होता है। पहाड़े रटने पड़ते है। संस्कृत को तो रटन्त विद्या ही कहा जाता है। प्रकारान्तर से यह रटाई किसी न किसी प्रकार हर छात्र को करनी पड़ती है। स्मृति पटल पर किसी नई बात को जमाने के लिए बार-बार दुहराये जाने की क्रिया अपनाये बिना और कोई रास्ता नहीं। एक बार याद कर लेने से कुछ बातें तो देर तक याद बनी रहती है, पर कुछ ऐसी हैं जो थोड़े दिन अभ्यास छोड़ देने से एक प्रकार से विस्मरणीय ही हो जाती है। स्कूली पढ़ाई छोड़ देने के उपरान्त यदि वे विषय काम में न आते रहे तो कुछ समय बाद विस्मृत हो जाते है। फौजी सिपाहियों को नित्य ही परेड करनी पड़ती है। पहलवान लोग बिना नागा अखाड़े में जाते और रोज ही दंड-बैठक करते हैं। संगीतकारों के लिए नित्य का रियाज आवश्यक हो जाता है कुछ समय के लिए भी वे गाने-बजाने का अभ्यास छोड़ दे तो उँगलियाँ लड़खड़ाने लगेंगी और ताल स्वरों में अड़चन उत्पन्न होने लगेगी। शिक्षण की लर्निंग भूमिका में पुनरावृत्ति का आश्रय लिया जाना आवश्यक है। जप द्वारा अव्यवस्त ईश्वरीय चेतना को स्मृति पटल पर जमाने की आवश्यकता होती है ताकि उपयोगी प्रकाश की अन्तःकरण में प्रतिष्ठापना हो सके। कुएँ की जगत में लगे पत्थर पर रस्सी की रगड़ बहुत समय तक पड़ते रहने से उसमें निशान बन जाते है। हमारी मनोभूमि भी इतनी कठोर हैं एक बार कहने से बात समझ में तो आ जाती है पर उसे स्वभाव की -अभ्यास की भूमिका तक उतारने के लिए बहुत समय तक दुहराने की आवश्यकता पड़ती है। पत्थर पर रस्सी की रगड़ से निशान पड़ने की तरह ही हमारी कठोर मनोभूमि पर भगवत् संस्कारों का गहराई तक जम सकना सम्भव है। शिक्षण की दूसरी परत है-रिटेन्शन अर्थात् प्रस्तुत जानकारी को स्वभाव का अंग बना लेना। तीसरी भूमिका है-रीकाल अर्थात् भूतकाल की किन्हीं विस्मृत स्थितियों को कुरेद-बीन कर फिर से संजीव कर लेना। चौथी भूमिका है-रीकाग्नीशन अर्थात् मान्यता प्रदान कर देना। निष्ठा आस्था-श्रद्धा एवं विश्वास में परिणत कर देना। उपासना में इन्हीं सब प्रयोजनों को पूरा करना पड़ता है। यह चारों ही परतें छेड़नी होती है। भगवान की समीपता अनुभव कराने वाली प्रतीक पूजा 'रिटेन्शन' है। ईश्वर के साथ आत्मा के अति प्राचीन सम्बन्धों को भूल जाने के कारण ही जीवन में भटकाव होता है। पतंग उड़ाने वाले के हाथ से डोरी छूट जाती है तभी वह इधर-उधर छितराती फिरती है। बाजीगर की उँगलियों से बँधे कठपुतली के सम्बन्ध सूत्र टूट जाएँ तो फिर वे लकड़ी के टुकड़े नाच किस प्रकार दिखा सकेंगे। कनेक्शन तार टूट जाने पर बिजली के यंत्र अपना काम करना बन्द कर देते हैं ईश्वर और जीव सम्बन्ध सनातन है पर वह माया में अत्यधिक प्रवृत्ति के कारण एक प्रकार से टूट ही गया है। इसे फिर से सोचने, सूत्र को नये सिरे ढूँढ़ने और टूटे सम्बन्धों को फिर से जोड़ने की प्रक्रिया रीकाल है। जप द्वारा यह उद्देश्य भी पूरा होता है। चौथी भूमिका में में 'रीकाग्नीशन' में पहुँचने पर जीवात्मा की मान्यता अपने भीतर ईश्वरीय प्रकाश विद्यमान होने की बनती है और वह वेदान्त तत्त्वज्ञान की भाषा में अयमात्मा ब्रह्म, 'यत्वमसि' सोहमस्मि, चिदानन्दोहम्, शिवोऽहम् की निष्ठा जीवित करता है। यह शब्दोच्चार नहीं वरन् मान्यता का स्तर है। जिसमें पहुँचे हुए मनुष्य का गुण, कर्म, स्वभाव, दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप ईश्वर जैसे स्तर का बन जाता है। उसकी स्थिति महात्मा एवं परमात्मा जैसी देखी और की जा सकती है। आत्मिक प्रगति के लिए चिन्तन क्षेत्र की जुताई करनी पड़ती ? तभी उसमें उपयोगिता फसल उगती है। खेत को बार-बार जोतने से ही उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ती है। नाम जप को एक प्रकार से खेत की जुताई कह सकते हैं । प्रहलाद की कथा है कि वे स्कूल में प्रवेश पाने के उपरान्त पट्टी पर केवल राम नाम ही लिखते थे। आगे की बात पढ़ने के लिए कहे जाने पर भी राम नाम ही खिलते रहे और कहते रहे। इस एक को ही पढ़ लेने पर सारी पढ़ाई पूरी हो जाती है। युधिष्ठिर की कथा भी ऐसी ही है। अन्य छात्रों ने आगे के पाठ याद कर लिये, पर वे पहला पाठ 'सत्यं वद' ही रटते लिखते रहे। अध्यापक ने आगे के पाठ पढ़ने के लिए कहा तो उनका उत्तर यही था कि एक पाठ याद हो जाने पर दूसरा पढ़ना चाहिए। उनका तात्पर्य यह था कि सत्य के प्रति अगाध निष्ठा और व्यवहार में उतारने की परिपक्वता उत्पन्न हो जाने तक उसी क्षेत्र में अपने चिन्तन को जोते रहना चाहिए। जप के लिए भारतीय धर्म में सर्वविदित और सर्वोपरि गायत्री मन्त्र का प्रतिपादन है। उसे गुरुमन्त्र कहा गया है। अन्तःचेतना को परिष्कृत करने में उसका जब बहुत ही सहायक सिद्ध होता है। वेदमाता उसे इसीलिए कहा गया है कि वेदों में सन्निहित ज्ञान-विज्ञान का सारा वैभव बीज रूप से इन थोड़े से अक्षरों में ही सन्निहित है। जप का भौतिक महत्व भी है। विज्ञान के आधार पर भी उसकी उपयोगिता समझी समझाई जा सकती है। शरीर और मन में अनेक दिव्य क्षमताएँ चक्रों, ग्रन्थि भेद और उपत्यिकाओं के रूप में विद्यमान है उनमें ऐसी सामर्थ्य विद्यमान है जिन्हें जगाया जा सके तो व्यक्ति को अतीन्द्रिय एवं अलौकिक विशेषताएँ प्राप्त हो सकती हैं। साधना का परिणाम सिद्धि है। यह सिद्धियाँ भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें जप को प्रथम स्थान दिया गया है।

 - अखंड ज्योति, दिसम्बर १९९५ के लेख जप प्रक्रिया का ज्ञान-विज्ञान से संकलित-सम्पादित

Sunday, 10 February 2013

आत्मविश्वास और अविरल अध्यवसाय

संसार के सारे महापुरुष प्रारंभ में साधारण क्षेणी, योग्यता, क्षमताओं के व्यक्ति रहे हैं। इतना होने पर भी उन्होंने अपने प्रति दृष्टिकोण हीन नहीं बनने दिया और निराशा को पास नहीं फटकने दिया। आत्मविश्वास एवं अविरल अध्यवसाय के बल पर वे कदम आगे बढ़ते ही गए। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वे लक्ष्य से विचलित नहीं हुए। नगण्य से साधन और अल्प योग्यता से होते हुए भी देश, धर्म, समाज और मानवता की सेवा में अपने जीवन की आहुति समर्पित कर समाज के सामने उदहारण प्रस्तुत कर गए और कोटि-कोटि जनों को दिशा प्रदान कर गए।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 32 से उधृत

Saturday, 9 February 2013

धर्म का सार तत्व

अस्त-व्यस्त जीवन जीना, जल्दबाजी करना, रात दिन व्यस्त रहना, हर पल क्षण को काम-काज में ही ठूंसते रहना भी मनः क्षेत्र में भारी तनाव पैदा करते हैं। अतः यहाँ यह आवश्यक हो जाता है कि अपनी जीवन विधि को, दैनिक जीवन को विवेकपूर्ण बनाकर चलें। ईमानदारी, संयमशीलता, सज्जनता, नियमितता, सुव्यवस्था से भरा पूरा हल्का-फुल्का जीवन जीने से ही मनः क्षेत्र का सदुपयोग होता है और ईश्वर प्रदत्त क्षमता से समुचित लाभ उठा सकने का सुयोग बनता है।

कर्त्तव्य के पालन का आनंद लूटो और विघ्नों से बिना डरे जूझते रहो। यही है धर्म का सार तत्व।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत , पृष्ठ 31 से उधृत

Friday, 8 February 2013

दूसरों पर आश्रित न हो

दूसरों से यह अपेक्षा करना की सभी हमारे होंगे और हमारे कहे अनुसार चलेंगे, मानसिक तनाव बने रहने का, निरर्थक उलझनों में फंसे रहने का मुख्य कारण है। इससे छुटकारा पाने के लिए यह आवश्यक है कि हम चुपचाप शांतिपूर्वक अपना काम करते चलें और लोगों को अपने हिसाब से चलने दें। किसी व्यक्ति पर हावी होने की  कोशिश न करें और न ही हर किसी को खुश करने के चक्कर में अपने अमूल्य समय और शक्ति का अपव्यय ही करें।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 30 से उधृत

Thursday, 7 February 2013

विचार और कार्य संतुलित करो

एक साथ बहुत सारे काम निबटाने के चक्कर में मनोयोग से कोई कार्य पूरा नहीं हो पाता। आधा-अधूरा कार्य छोड़कर मन दूसरे कार्यों की और दौड़ने लगता है। यहीं से श्रम, समय की बर्बादी प्रारंभ होती है तथा मन में खीज उत्पन्न होती है। विचार और कार्य सीमित एवं संतुलित कर लेने से श्रम और शक्ति का अपव्यय रुक जाता है और व्यक्ति सफलता के सोपानों पर चढ़ता चला जाता है।

कोई भी काम करते समय अपने मन को उच्च भावों से और संस्कारों से ओत-प्रोत रखना ही सांसारिक जीवन में सफलता का मूल मंत्र है। हम जहाँ रह रहे हैं उसे नहीं बदल सकते पर अपने आपको बदल कर हर स्थिति में आनंद ले सकते हैं।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 29 से उधृत

Wednesday, 6 February 2013

संतोष भरा जीवन जियेंगे

समझदारी और विचारशीलता का तकाजा है कि संसार चक्र के बदलते क्रम के अनुरूप अपनी मनः स्थिति को तैयार रखा जाए। लाभ, सुख, सफलता, प्रगति, वैभव, आदि मिलने पर अहंकार से एंठने की जरूरत नहीं है। कहा नहीं जा सकता की वह स्थिति कब तक रहेगी। ऐसी दशा में रोने-झींकने, खीजने, निराश होने में शक्ति नष्ट करना व्यर्थ है। परिवर्तन के अनुरूप अपने को ढालने में, विपन्नता को सुधारने में सोचने, हल निकलने और तालमेल बिठाने में मस्तिष्क को लगाया जाये तो यह प्रयत्न रोने और सिर धुनने की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर होगा।

बुद्धिमानी इसी में है की जो उपलब्ध है उसका आनंद लिया जाय और संतोष भरा संतुलन बनाए रखा जाये।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 28 से उधृत

Tuesday, 5 February 2013

खिलाडी भावना को अपनाओ

आपके विषय में, आपकी योजनाओं के विषय में, आपके उद्देश्यों के विषय में अन्य लोग जो कुछ विचार करते हैं, उस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। अगर वे आपको कल्पनाओं के पीछे दौड़ने वाला उन्मुक्त अथवा स्वप्न देखने वाला कहें तो उसकी परवाह  मत करो। तुम अपने व्यक्तित्व पर श्रद्धा को बनाये रहो। किसी मनुष्य के कहने, से किसी आपत्ति के आने से अपने आत्मविश्वास को डगमगाने मत दो। आत्मश्रद्धा को कायम रखोगे और आगे बढ़ते रहोगे तो जल्दी या देर में संसार आपको रास्ता देगा ही।

आगे भी प्रगति के प्रयास तो जारी रखे ही जायें पर वह सब खिलाड़ी भावना से ही किया जाये।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 27 से उधृत 

Monday, 4 February 2013

आप अपने मित्र भी हो और शत्रु भी

इस बात का शोक  मत करो की मुझे बार-बार असफल होना पड़ता है। परवाह मत करो क्योंकि समय अनंत है। बार-बार प्रयत्न करो और आगे की और कदम बढाओ। निरंतर कर्तव्य करते रहो, आज नहीं तो कल तुम सफल हो कर रहोगे।

सहायता के लिए दूसरों के सामने मत गिड़गिडाओ क्योंकि यथार्थ में भी इतनी शक्ति नहीं है जो तुम्हारी सहायता कर सके। किसी कष्ट के लिए दूसरों पर दोषारोपण मत करो, क्योंकि यथार्थ में कोई भी तुम्हें दुःख नहीं पहुंचा सकता। तुम स्वयं ही अपने मित्र हो और स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो कुछ भली बुरी स्थितियाँ सामने है वह तुम्हारी ही पैदा की हुई हैं। अपना दृष्टिकोण बदल दोगे तो दूसरे ही क्षण यह भय के भूत अंतरिक्ष में तिरोहित हो जायेंगे।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 26 से उधृत

Sunday, 3 February 2013

आत्मविश्वास जागृत करो

जब निराशा और असफलता को अपने चारों और मंडराते देखो तो समझो की तुम्हारा चित्त स्थिर नहीं, तुम अपने ऊपर विशवास नहीं करते।

वर्तमान दशा से छुटकारा नहीं हो सकता जब तक की अपने पुराने सड़े-गले विचारों को बदल न डालो। जब तक यह विश्वास न हो जाये की तुम अपने अनुकूल चाहे जैसी अवस्था निर्माण कर सकते हो तब तक तुम्हारे पैर उन्नति की और बढ़ नहीं सकते। अगर आगे भी न संभालोगे तो हो सकता है की दिव्य तेज किसी दिन बिलकुल ही क्षीण हो जाये। यदि तुम अपनी वर्तमान अप्रिय अवस्था से छुटकारा पाना चाहते हो तो अपनी मानसिक निर्बलता को दूर भगाओ। अपने अन्दर आत्मविश्वास जागृत करो।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 25 से उधृत

Saturday, 2 February 2013

आत्मशक्ति पर विश्वास रखो

क्या करें, परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल नहीं हैं, कोई हमारी सहायता नहीं करता, कोई मौका नहीं मिलता आदि शिकायतें निरर्थक हैं। अपने दोषों को दूसरों पर थोपने के लिए इस प्रकार की बातें अपनी दिल जमाई के लिए कहीं जाती हैं। लोग कभी प्रारब्ध को मानते हैं, कभी देवी देवताओं के सामने नाक रगड़ते हैं। इस सबका कारण है अपने ऊपर विशवास का न  होना।

दूसरों को सुखी देखकर हम परमात्मा के न्याय पर उंगली उठाने लगते हैं। पर यह नहीं देखते की जिस परिश्रम से इन सुखी लोगों ने अपने काम पूरे किये हैं, क्या वह हमारे अन्दर है। ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता उसने वह आत्मशक्ति सबको मुक्त हाथों से प्रदान की है जिसके आधार पर उन्नति की जा सके।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 24 से उधृत 

Friday, 1 February 2013

चिंतन और चरित्र का समन्वय

 अपने दोष दूसरों पर थोपने से कुछ काम न चलेगा। हमारी शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलताओं के लिए दूसरे उत्तरदायी नहीं वरन हम स्वयं ही हैं। दूसरे व्यक्तियों, परिस्थितियों एवं प्रारब्ध भोगों का भी प्रभाव होता है। पर  चौथाई जीवन तो हमारे आज के दृष्टिकोण एवं कर्तव्य का ही प्रतिफल होता है। अपने को सुधारने  का काम हाथ में ले कर हम अपनी शारीरिक और मानसिक परेशानियों को आसानी से हल कर सकते हैं।

प्रभाव उनका नहीं पड़ता जो बकवास तो बहुत करते हैं पर स्वयं उस ढांचे में ढलते नहीं। जिन्होंने चिंतन और चरित्र का समन्वय अपने जीवन क्रम में किया है, उनकी सेवा साधना सदा फलती-फूलती रहती है।

 -  पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 23 से उधृत

Thursday, 31 January 2013

लगन और श्रम का महत्त्व

लगन आदमी के अन्दर हो तो सौ गुना काम करा लेती है। इतना काम करा लेती है कि हमारे काम को देख कर आपको आश्चर्य होगा। इतना साहित्य लिखने से लेकर इतना बड़ा संगठन खड़ा करने तक और इतनी बड़ी क्रांति करने से लेकर के इतने आश्रम बनाने तक जो काम शुरू किये हैं वे कैसे हो गए? यह लगन और श्रम है।

यदि हमने श्रम से जी चुराया होता तो उसी तरीके से घटिया आदमी हो करके रह जाते जैसे की अपना पेट पालना ही जिनके लिए मुश्किल हो जाता है। चोरी से, ठगी से, चालाकी से जहाँ कहीं भी मिलता पेट भरने के लिए, कपडे पहनने के लिए और अपना मौज, शौक पूरा करने के लिए पैसा इक्कठा करते रहते पर हमारा यह बड़ा काम संभव नहीं हो पता।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 22 से उधृत 

Wednesday, 30 January 2013

भटकना मत

लोभों के झोंके, मोहों के झोंके, नामवरी के झोंके, यश के झोंके, दबाव के झोंके ऐसे हैं की आदमी को लम्बी राह पर चलने के लिए मजबूर कर देते हैं और कहाँ से कहाँ घसीट ले जाते हैं। हमको भी घसीट ले गए होते। ये सामान्य आदमियों को घसीट ले जाते हैं। बहुत से व्यक्तियों में जो सिद्धांतवाद की राह पर चले, इन्ही के कारण भटक कर कहाँ से कहाँ जा पहुंचे।

आप भटकना मत। आपको जब कभी भटकन आये तो आप अपने उस दिन की, उस समय की मनः स्थिति को याद कर लेना, जबकि आपके भीतर से श्रद्धा का एक अंकुर उगा था। उसी बात को याद रखना की परिश्रम करने के प्रति जो हमारी उमंग और तरंग होनी चाहिए उसमें तो कमीं नहीं आ रही।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 21 से उधृत

Tuesday, 29 January 2013

पुरुषार्थ की शक्ति

सुधारवादी तत्वों की स्थिति और भी उपाहास्पद है। धर्म, अध्यात्म, समाज एवं राजनीतिक क्षेत्रों में सुधार एवं उत्थान के नारे जोर-शोर से लगाये जाते हैं। पर उन क्षेत्रों में जो हो रहा है, जो लोग कर रहे हैं, उसमें कथनी और करनी के बीच ज़मीन आसमान जैसा अंतर देखा जा सकता है। ऐसी दशा में उज्जवल भविष्य की आशा धूमिल ही होती चली जा रही है।

क्या हम सब ऐसे ही समय की प्रतीक्षा में, ऐसे ही हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहें। अपने को असहाय, असमर्थ अनुभव करते रहें और स्थिति बदलने के लिए किसी दूसरे पर आशा लगाये बैठे रहें। मानवी पुरुषार्थ कहता है, ऐसा नहीं होना चाहिए।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 20 से उधृत 

Monday, 28 January 2013

पौरुष की पुकार

साहस ने हमें पुकारा है। समय ने, युग ने, कर्त्तव्य ने, उत्तरदायित्व ने, विवेक ने, पौरुष ने हमें पुकारा है। यह पुकार अनसुनी न की जा सकेगी। आत्म-निर्माण के लिए, नव-निर्माण के लिए हम काँटों से भरे रास्ते का स्वागत करेंगे और आगे बढ़ेंगे। लोग क्या कहते हैं और क्या करते हैं, इसकी चिंता कौन करे। अपनी आत्मा ही मार्गदर्शन के लिए पर्याप्त है। लोग अँधेरे में भटकते हैं, भटकते रहें। हम अपने विवेक के प्रकाश का अवलंबन कर स्वतः आगे बढ़ेंगे। कौन विरोध करता है, कौन समर्थन? इसकी गणना कौन करे। अपनी अंतरात्मा, अपना साहस अपने साथ है और वही करेंगे, जो करना अपने जैसे सजग व्यक्तियों के लिए उचित और उपयुक्त है।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 19 से उधृत

Sunday, 27 January 2013

बोलिए कम, करिए अधिक

'हमारी कोई सुनता नहीं, कहते कहते थक गए पर सुनने वाले कोई सुनते नहीं अर्थात उन पर कुछ असर ही नहीं होता' - मेरी राय में इसमें सुनने वाले से अधिक दोष कहने वाले का है। कहने वाले करना नहीं जानते। वे अपनी और देखें। आत्म निरीक्षण कार्य की शून्यता की साक्षी दे देगा। वचन की सफलता का सारा दारोमदार कर्मशीलता में है। आप चाहें बोले नहीं, थोडा ही बोलें पर कार्य में जुट जाइये। आप थोड़े ही दिनों में देखेंगे की लोग बिना कहे आपकी और खिचें आ रहे हैं। अतः कहिये कम, करिए अधिक। क्योंकि बोलने का प्रभाव तो क्षणिक होगा और कार्य का प्रभाव स्थाई होता है।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 18 से उधृत

Saturday, 26 January 2013

सुख-दुखों के ऊपर स्वामित्व

तुम सुख, दुःख की अधीनता छोड़ उनके ऊपर अपना स्वामित्व स्थापन करो और उसमें जो कुछ उत्तम मिले उसे लेकर अपने जीवन को नित्य, नया, रसयुक्त बनाओ। जीवन को उन्नत करना ही मनुष्य का कर्तव्य है इसीलिए तुम भी उचित समझो सो मार्ग ग्रहण कर इस कर्तव्य को सिद्ध करो।

प्रतिकूलताओं से डरोगे नहीं और अनुकूलता ही को सर्वस्व मान कर बैठे रहोगे तो सब कुछ कर सकोगे। जो मिले उसी से शिक्षा ग्रहण कर जीवन को उच्च बनाओ। यह जीवन ज्यों-ज्यों उच्च बनेगा त्यों-त्यों  आज जो तुम्हें प्रतिकूल प्रतीत होता है वह सब अनुकूल दिखने लगेगा और अनुकूलता आ जाने पर दुःख मात्र की निवृत्ति हो जायेगी।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 17 से उधृत

Friday, 25 January 2013

दुःखद स्मृतियों को भूलो

जब मन में पुरानी दुःखद स्मृतियाँ सजग हों तो उन्हें भुला देने में ही श्रेष्ठता है। अप्रिय बातों को भुलाना आवश्यक है। भुलाना उतना ही जरूरी है जितना अच्छी बात का स्मरण करना। यदि तुम शरीर से, मन से और आचरण से स्वस्थ होना चाहते हो तो अस्वस्थता की सारी बातें भूल जाओ।

माना कि किसी 'अपने' ने ही तुम्हें चोट पहुंचाई है, तुम्हारा दिल दुखाया है, तो क्या तुम उसे लेकर मानसिक उधेड़बुन में लगे रहोगे। अरे भाई! उन कष्टकारक अप्रिय प्रसंगों को भुला दो, उधर ध्यान न देकर अच्छे शुभ कर्मों से मन को केंद्रीभूत कर दो।

चिंता से मुक्ति पाने का सर्वोत्तम उपाय दुखों को भूलना ही है।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 16 से उधृत

Thursday, 24 January 2013

असफलताओं का कारण

हम दूसरों को बरबस अपनी तरह विश्वास, मत, स्वभाव एवं नियमों के अनुसार कार्य करने और जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य करते हैं। दूसरों को बरबस सुधार डालने, अपने विचार या दृष्टिकोण को जबरदस्ती थोपने से न सुधार होता है न आपका ही मन प्रसन्न होता है।

यदि हम अमुक व्यक्ति को दबाए रखेंगे तो अवश्य परोक्ष रूप से हमारी उन्नति हो जायेगी। अमुक व्यक्ति हमारी उन्नति में बाधक है। अमुक हमारी चुगली करता है, दोष निकलता है, मानहानि करता है। अतः हमें अपनी उन्नति न देख कर पहले अपने प्रतिपक्षी को रोके रखना चाहिए - ऐसा सोचना और दूसरों को अपनी असफलताओं का कारण मानना, भ्रममूलक है।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 15 से उधृत

Wednesday, 23 January 2013

प्रेम एक महान शक्ति

 प्रेम ही एक ऐसी महान शक्ति है जो प्रत्येक दिशा में जीवन को आगे बढ़ाने में सहायक होती है। बिना प्रेम के किसी के विचारों में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। विचार तर्क-वितर्क की सृष्टि नहीं हैं। विचारणा तथा विश्वास बहुकाल के सत्संग से बनते हैं। अधिक समय की संगति का ही परिणाम प्रेम है। इसीलिए विचार धारणा अथवा विशवास प्रेम का विषय है।

यदि हम दूसरों पर विजय प्राप्त करके उनको अपनी विचारधारा में बहाना चाहते हैं, उनके दृष्टिकोण को बदलकर अपनी बात मनवाना चाहते हैं, तो प्रेम का सहारा लेना चाहिए। तर्क और बुद्धि हमें आगे नहीं बढ़ा सकते हैं। विशवास रखिये की आपकी प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण सभी बातों को सुनने के लिए दुनिया विवश होगी।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 14 से उधृत

Tuesday, 22 January 2013

दूसरों पर निर्भर न रहो

जिस दिन तुम्हें अपने हाथ-पैर और दिल पर भरोसा हो जावेगा, उसी दिन तुम्हारी अंतरात्मा कहेगी की, 'बाधाओं को कुचल कर तू अकेला चल अकेला।'

जिन व्यक्तियों पर तुमने आशा के विशाल महल बना रखे हैं वे कल्पना के व्योम में विहार करने के सामान हैं। अस्थिर सारहीन खोखले हैं। अपनी आशा को दूसरों में संश्लिष्ट कर देना स्वयं अपनी मौलिकता का ह्रास कर अपने साहस को पंगु कर देना है। जो व्यक्ति दूसरों की सहायता पर जीवन यात्रा करता है। वह शीघ्र अकेला रह जाता है।

दूसरों को अपने जीवन का संचालक बना देना ऐसा ही है जैसा अपनी नौका को ऐसे प्रवाह में डाल देना जिसके अंत का आपको कोई ज्ञान नहीं।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत , पृष्ठ 13 से उधृत

Monday, 21 January 2013

अकेला चलो

महान व्यक्ति सदैव अकेले चले हैं और इस अकेलेपन के कारण ही दूर तक चलें हैं। अकेले व्यक्तियों ने अपने सहारे ही संसार के महानतम कार्य संपन्न किये हैं। उन्हें एकमात्र अपनी ही प्रेरणा प्राप्त हुई है। वे अपने ही आतंरिक सुख से सदैव प्रफुल्लित रहे हैं। दूसरे से दुःख मिटाने की उन्होंने कभी आशा नहीं रखी। निज वृतियों में ही उन्होंने सहारा नहीं देखा।

अकेलापन जीवन का परम सत्य है। किन्तु अकेलेपन से घबराना, जी तोडना, कर्तव्यपथ से हतोत्साहित या निराश होना सबसे बड़ा पाप है। अकेलापन आपके निजी आतंरिक प्रदेश में छिपी हुई महान शक्तियों को विकसित करने का साधन है। अपने ऊपर आश्रित रहने से आप अपनी उच्चतम शक्तियों को खोज निकालते हैं।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 12 से उधृत

Sunday, 20 January 2013

अंतःकरण के धन को ढूँढो

तुम्हें अपने मन को सदा कार्य में लगाये रखना होगा। इसे बेकार न रहने दो। जीवन को गंभीरता के साथ बिताओ। तुम्हारे सामने आत्मोन्नति का महान कार्य है और पास में समय थोडा है। यदि अपने को असावधानी के साथ भटकने दोगे तो तुम्हे शोक करना होगा और इससे भी बुरी स्थिति को प्राप्त होगे।

धैर्य और आशा रखो तो शीघ्र ही जीवन की समस्त स्थिति का सामना करने की योग्यता तुममें आ जाएगी। अपने बल पर खड़े होओ। यदि आवश्यक हो तो समस्त संसार को चुनोती दे दो। परिणाम में तुम्हारी हानि नहीं सकती। तुम केवल सबसे महान से संतुष्ट रहो। दूसरे भौतिक धन की खोज करते हैं और तुम अंतःकरण के धन को ढूँढो।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 11 से उधृत

Saturday, 19 January 2013

नम्रता, सरलता, साधुता, सहिष्णुता

सहिष्णुता का अभ्यास करो। अपने उत्तरदायित्वों को समझो। किसी के दोषों को देखने और उन पर टीका-टिपण्णी करने के पहले अपने बड़े-बड़े दोषों का अन्वेषण करो। यदि अपनी वाणी का नियंत्रण नहीं कर सकते तो उसे दूसरों के प्रतिकूल नहीं बल्कि अपने प्रतिकूल उपदेश करने दो।

सबसे पहले अपने घर को नियमित बनाओ क्योंकि बिना आचरण के आत्मानुभव नहीं हो सकता। नम्रता, सरलता, साधुता, सहिष्णुता ये सब आत्मानुभव के प्रधान अंग हैं।

दूसरे तुम्हारे साथ क्या करते हैं इसकी चिंता न करो। आत्मोन्नति में तत्पर रहो। यदि यह तथ्य समझ लिया तो एक बड़े रहस्य को पा लिया।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 10 से उधृत

Friday, 18 January 2013

अपने आपकी समालोचना करो

 जो कुछ हो, होने दो। तुम्हारे बारे में जो कहा जाए उसे कहने दो। तुम्हें ये सब बातें मृगतृष्णा के जल के समान असार लगनी चाहिए। यदि तुमने संसार का सच्चा त्याग किया है तो इन बातों से तुम्हें कैसे कष्ट पहुँच सकता है। अपने आपकी समालोचना में कुछ भी कसार मत रखना तभी वास्तविक उन्नति होगी।

प्रत्येक क्षण और अवसर का लाभ उठाओ। मार्ग लम्बा है। समय वेग से निकला जा रहा है। अपने संपूर्ण आत्मबल के साथ कार्य में लग जाओ, लक्ष्य तक पहुंचोगे।

किसी बात के लिए भी अपने को क्षुब्ध न करो। मनुष्य में नहीं ईश्वर में विशवास करो। वह तुम्हें रास्ता दिखायेगा और सन्मार्ग सुझाएगा।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 9 से उधृत

Thursday, 17 January 2013

मार्गदर्शन के लिए अपनी ही ओर देखो

साक्षात्कार संपन्न पुरुष न तो दूसरों को दोष लगता है और न अपने को अधिक शक्तिमान वस्तुओं से आच्छादित होने के कारण वह स्थितियों की अवहेलना करता है।

अहंकार से उतना ही सावधान रहो जितना एक पागल कुत्ते से। जैसे तुम विष या विषधर सर्प को नहीं छूते, उसी प्रकार सिद्धियों से अलग रहो और उन लोगों से भी जो इनका प्रतिवाद करते हैं। अपने मन और हृदय की संपूर्ण क्रियाओं को ईश्वर की और संचारित करो।

दूसरों का विश्वास तुम्हें अधिकाधिक असहाय और दुखी बनाएगा। मार्गदर्शन के लिए अपनी ही ओर देखो, दूसरों की ओर नहीं। तुम्हारी सत्यता तुम्हें दृढ़ बनाएगी। तुम्हारी दृढ़ता तुम्हें लक्ष्य तक ले जाएगी।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 8 से उधृत

Wednesday, 16 January 2013

आत्म समर्पण करो

 तुम्हें यह सीखना होगा कि इस संसार में कुछ कठिनाईयाँ हैं जो तम्हे सहन करनी हैं। वे पूर्व कर्मों के फलस्वरूप तुम्हें अजेय प्रतीत होती हैं। जहाँ कहीं भी कार्य में घबराहट थकावट और निराशाएँ हैं, वहां अत्यंत प्रबल शक्ति भी है। अपना कार्य कर चुकने पर एक और खड़े होओ। कर्म के फल को समय की धारा में प्रवाहित हो जाने दो।

अपनी शक्ति भर कार्य करो और तब अपना आत्मसमर्पण करो। किन्हीं भी घटनाओं में हतोत्साहित न होओ। तुम्हारा अपने ही कर्मों पर अधिकार हो सकता है। दूसरों के कर्मों पर नहीं। आलोचना न करो, आशा न करो भय न करो, सब अच्छा ही होगा। अनुभव आता है और जाता है। खिन्न न होओ। तुम दृढ़ भित्ति पर खड़े हुए हो।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 7 से उधृत 

Tuesday, 15 January 2013

हँसते रहो, मुस्कुराते रहो

उठो! जागो! रुको मत!!! जब तक की लक्ष्य प्राप्त न हो जाये। कोई दूसरा हमारे प्रति बुराई करे या निंदा करे, उद्वेगजनक बात कहे तो उसको सहन करने और उसे उत्तर न देने से बैर आगे नहीं बढ़ता। अपने ही मन में कह लेना चाहिए कि इसका सबसे अच्छा उत्तर है मौन। जो अपने कर्तव्य कार्य में जुटा रहता है और दूसरों के अवगुणों की खोज में नहीं रहता उसे आतंरिक प्रसन्नता रहती है।

जीवन में उतार-चढाव आते ही रहते हैं।

हँसते रहो, मुस्कुराते रहो।

ऐसा मुख किस काम का जो हँसे नहीं मुस्कुराए नहीं।

जो व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति स्थिर रखना चाहता हैं, उनको दूसरों की आलोचनाओं से चिढना नहीं चाहिए।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 6 से उधृत

Monday, 14 January 2013

जीवन को यज्ञमय बनाओ

 मन में सबके लिए सद्भावनाएँ रखना, संयमपूर्ण सच्चरित्रता के साथ समय व्यतीत करना, दूसरों की भलाई बन सके उसके लिए प्रयत्नशील रहना, वाणी को केवल सत्प्रयोजनों के लिए ही बोलना, न्यायपूर्ण कमी पर ही गुजर करना, भगवान् का स्मरण करते रहना, अपने कर्तव्य पथ पर आरूढ़ रहना, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित न होना-यही नियम हैं जिनका पालन करने से जीवन यज्ञमय हो जाता है। मनुष्य जीवन को सफल बना लेना ही सच्ची दूरदर्शिता और बुद्धिमता है।

जब तक हम में अहंकार की भावना रहेगी तब तक त्याग की भावना का उदय होना कठिन है।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ट 5 से उधृत 

Sunday, 13 January 2013

अंतरात्मा का सहारा पकड़ो

यदि तुम शांति, सामर्थ्य और शक्ति चाहते हो तो अपनी अंतरात्मा का सहारा पकड़ो। तुम सारे संसार को धोखा दे सकते हो किन्तु अपनी आत्मा को कौन धोखा दे सका है। यदि प्रत्येक कार्य में आप अंतरात्मा की सम्मति प्राप्त कर लिया करेंगे तो विवेक पथ नष्ट न होगा. दुनिया भर का विरोध करने पर भी यदि आप अपनी अंतरात्मा का पालन कर सके तो कोई आपको सफलता प्राप्त करने से नहीं रोक सकता।

जब कोई मनुष्य अपने आपको अद्वितीय व्यक्ति समझने लगता है और अपने आपको चरित्र में सबसे श्रेष्ठ मानने लगता है, तब उसका आध्यात्मिक पतन होता है।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 4 से उधृत 

Saturday, 12 January 2013

मानवमात्र से प्रेम करो

हम जिस भारतीय संस्कृति, भारतीय विचारधारा का प्रचार करना चाहते हैं, उससे आपके समस्त कष्टों का निवारण हो सकता है। राजनीतिक शक्ति  द्वारा आपके अधिकारों की रक्षा हो सकती है। पर जिस स्थान से हमारे सुख-दुःख की उत्पत्ति होती है उसका नियंत्रण राजनीतिक शक्ति नहीं कर सकती। यह कार्य आध्यात्मिक उन्नति से ही संपन्न हो सकता है।

मनुष्य को मनुष्य बनाने की वास्तविक शक्ति भारतीय संस्कृति में ही है। यह संस्कृति हमें सिखाती है कि मनुष्य-मनुष्य से प्रेम करने को पैदा हुआ है, लड़ने-मरने को नहीं। अगर हमारे सभी कार्यक्रम ठीक ढंग से चलते रहे तो भारतीय संस्कृति का सूर्योदय अवश्य होगा।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 3 से उधृत

Friday, 11 January 2013

आध्यात्मिक चिंतन अनिवार्य

 जो लोग आध्यात्मिक चिंतन से विमुख होकर केवल लोकोपकारी कार्य में लगे रहते हैं, वे अपनी ही सफलता पर अथवा सद्गुणों पर मोहित हो जाते हैं। वे अपने आपको लोक सेवक के रूप में देखने लगते हैं। ऐसी अवस्था में वे आशा करते हैं की सब लोग उनके कार्यों की प्रशंसा करें, उनका कहा मानें। उनका बढ़ा हुआ अभिमान उन्हें अनेक लोगों का शत्रु बना देता है। इससे उनकी लोकसेवा उन्हें वास्तविक लोक सेवक न बनाकर लोक विनाश का रूप धारण कर लेती है।

आध्यात्मिक चिंतन के बिना मनुष्य में विनीत भाव नहीं आता, और न उसमें अपने आपको सुधारने की क्षमता रह जाती है। वह भूलों पर भूल करता चला जाता है। और इस प्रकार अपने जीवन को विकल बना देता है।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
(हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 2 से उधृत)

Thursday, 10 January 2013

अपने को देखो

दूसरे के छिद्र देखने से पहले अपने छिद्रों को टटोलो। किसी और की बुराई करने से पहले यह देख लो की हममें तो कोई बुराई नहीं है। यदि हो तो पहले उसे दूर करो। दूसरों की निंदा करने में जितना समय देते हो उतना समय अपने आत्मोत्कर्ष में लगाओ। तब स्वयं इससे सहमत होगे कि परनिंदा से बढ़ने वाले द्वेष को त्याग कर परमानन्द प्राप्ति की और बढ़ रहे हो।

संसार को जीतने की इच्छा वाले मनुष्यो! पहले अपने को जीतने की चेष्टा करो। यदि तुम ऐसा कर सके तो एक दिन तुम्हारा विश्व विजेता बनने का स्वप्न पूरा हो कर रहेगा। तुम अपने जितेन्द्रिय रूप से संसार के सब प्राणियों को अपने संकेत पर चला सकोगे। संसार का कोई भी जीव तुम्हारा विरोधी नहीं रहेगा।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'