ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
उस प्राण स्वरुप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
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Saturday, 12 January 2013

मानवमात्र से प्रेम करो

हम जिस भारतीय संस्कृति, भारतीय विचारधारा का प्रचार करना चाहते हैं, उससे आपके समस्त कष्टों का निवारण हो सकता है। राजनीतिक शक्ति  द्वारा आपके अधिकारों की रक्षा हो सकती है। पर जिस स्थान से हमारे सुख-दुःख की उत्पत्ति होती है उसका नियंत्रण राजनीतिक शक्ति नहीं कर सकती। यह कार्य आध्यात्मिक उन्नति से ही संपन्न हो सकता है।

मनुष्य को मनुष्य बनाने की वास्तविक शक्ति भारतीय संस्कृति में ही है। यह संस्कृति हमें सिखाती है कि मनुष्य-मनुष्य से प्रेम करने को पैदा हुआ है, लड़ने-मरने को नहीं। अगर हमारे सभी कार्यक्रम ठीक ढंग से चलते रहे तो भारतीय संस्कृति का सूर्योदय अवश्य होगा।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 3 से उधृत

Friday, 11 January 2013

आध्यात्मिक चिंतन अनिवार्य

 जो लोग आध्यात्मिक चिंतन से विमुख होकर केवल लोकोपकारी कार्य में लगे रहते हैं, वे अपनी ही सफलता पर अथवा सद्गुणों पर मोहित हो जाते हैं। वे अपने आपको लोक सेवक के रूप में देखने लगते हैं। ऐसी अवस्था में वे आशा करते हैं की सब लोग उनके कार्यों की प्रशंसा करें, उनका कहा मानें। उनका बढ़ा हुआ अभिमान उन्हें अनेक लोगों का शत्रु बना देता है। इससे उनकी लोकसेवा उन्हें वास्तविक लोक सेवक न बनाकर लोक विनाश का रूप धारण कर लेती है।

आध्यात्मिक चिंतन के बिना मनुष्य में विनीत भाव नहीं आता, और न उसमें अपने आपको सुधारने की क्षमता रह जाती है। वह भूलों पर भूल करता चला जाता है। और इस प्रकार अपने जीवन को विकल बना देता है।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
(हारिये न हिम्मत, पृष्ठ 2 से उधृत)

Thursday, 10 January 2013

अपने को देखो

दूसरे के छिद्र देखने से पहले अपने छिद्रों को टटोलो। किसी और की बुराई करने से पहले यह देख लो की हममें तो कोई बुराई नहीं है। यदि हो तो पहले उसे दूर करो। दूसरों की निंदा करने में जितना समय देते हो उतना समय अपने आत्मोत्कर्ष में लगाओ। तब स्वयं इससे सहमत होगे कि परनिंदा से बढ़ने वाले द्वेष को त्याग कर परमानन्द प्राप्ति की और बढ़ रहे हो।

संसार को जीतने की इच्छा वाले मनुष्यो! पहले अपने को जीतने की चेष्टा करो। यदि तुम ऐसा कर सके तो एक दिन तुम्हारा विश्व विजेता बनने का स्वप्न पूरा हो कर रहेगा। तुम अपने जितेन्द्रिय रूप से संसार के सब प्राणियों को अपने संकेत पर चला सकोगे। संसार का कोई भी जीव तुम्हारा विरोधी नहीं रहेगा।

 - पं श्रीराम शर्मा 'आचार्य'

Sunday, 10 April 2011

गायत्री ही युग शक्ति क्यों?

मनुष्य मात्र को जीवन लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ गुरुमंत्र - गायत्री महामंत्र

मनुष्य मात्र को उज्जवल भविष्य प्रदान करने में सक्षम गायत्री महाविद्या - सबके लिए सुलभ, सबके लिए साध्य, सबके लिए हितकर। इसे समझें, अपनाएँ, साधें और अनुपम लाभ उठायें।

ज्ञान (मार्गदर्शक बोध सूत्र)

१. ज्ञानपक्ष - गायत्री के ज्ञानपक्ष को उच्चस्तरीय तत्त्व ज्ञान की, ब्रह्मविद्या की, ऋतंभरा प्रज्ञा की संज्ञा दी जा सकती है। इसका उपयोग आस्थाओं और आकांशाओं को उच्चस्तरीय बनाने के लिए आवश्य क प्रशिक्षण के रूप में किया जा सकता है। ज्ञान-यज्ञ, विचारक्रांति आदि के बौद्धिक उत्कृष्टता के साधन इसी आधार पर जुटते हैं। लेखनी, वाणी एवं दृश्य-श्रव्य जैसे साधनों का उपयोग इसी निमित्त होता है। स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन-मनन की गतिविधियाँ इसी के निमित्त चलती हैं।

विज्ञान (दिव्यता प्रदायक श्रेष्ठ उपचार)

२. विज्ञान पक्ष - मानवी सत्ता के अंतराल में इतनी महान संभावनाएँ और क्षमताएँ प्रसुप्त स्थिति में भरी पड़ी हैं कि उन्हें प्रकारांतर से ब्रह्मचेतना की प्रतिकृति (ट्रू कापी) कहा जा सके। अंतराल की प्रसुप्ति ही दरिद्रता है और उसकी जागृति में सम्पन्नता का महासागर लहलहाता देखा जा सकता है। साधना विज्ञान के माध्यम से जो उसे जगाने, साधने और सदुपयोग करने में समर्थ हो सके, वे महान कहलाये, स्वयं धन्य बने हैं और अपने संपर्क क्षेत्र के जन-समुदाय एवं वातावरण को धन्य बनाया है।

युगशक्ति - परिवर्तन व्यक्ति के अंतराल का होना है। दृष्टिकोण बदला जाना है। आस्थाओं का परिष्कार किया जाना है और आकांशाओं का प्रवाह मोड़ना है। सदाशयता का पक्षधर मनोबल उभारना है। आत्मज्ञान प्राप्त करना और आत्म-गौरव जगाना है, यही है युग परिवर्तन का मुख्य आधार। आतंरिक परिष्कार की प्रक्रिया ही व्यक्ति की उत्कृष्टता और समाज की श्रेष्ठता के रूप में परिलक्षित होगी। सारा प्रयास-पुरुषार्थ अन्तर्जगत् से सम्बंधित है। इसलिए साधन भी उसी स्तर के होने चाहिए। सामर्थ्य ऐसी होनी चाहिए, जो अभीष्ट प्रयोजन को पूरा कर सकने के उपयुक्त सिध्द हो सके। निश्चित रूप से यह कार्य आत्मशक्ति का ही है। उत्पादन और उपयोग उसी का किया जाना है।युग निर्माण के लिए इसी उर्जा का उपार्जन आधारभूत काम समझा जा सकता है। ऐसा काम, जिसे करने की आवश्यकता ठीक इन्ही दिनों है। सर्वसमर्थ परमात्मा के छोटे घटक आत्मा की मूर्छना को जागृति में बदल देने की प्रक्रिया आध्यात्म-साधना के विभिन्न विधि-विधानों में गायत्री उपासना ही सर्वश्रेष्ठ और सर्वसुलभ मन गया है। आदिकाल से लेकर आज तक उस महाविज्ञान के सम्बन्ध में अनुभवों और प्रयोगों की विशालकाय शृंखला जुडती चली आई है। प्रत्येक शोध में उसकी नितनूतन विशेषताएँ उभरती चली आई हैं। प्रत्येक प्रयोग में उसके अभिनव शक्ति स्रोत प्रकट होते रहे हैं।

 - शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार

Wednesday, 30 March 2011

असंख्य समस्याओं का एकमात्र हल - विचार-क्रान्ति

दुर्भाग्य को क्या कहा जाय जिसने हमारी विचार प्रणाली में विष घोल दिया और हम हर बात को उलटे ढंग से सोचने लगे। इस उल्टी बुद्धि का एक छोटा-सा नमूना देखा जाय। कई लोगों में सन्तान या लडक़ा नहीं होता। वस्तुत: यह लोग बहुत ही सुखी और सौभाग्यशाली हैं। बढ़ती हुई आबादी में और बढ़ोत्तरी करना - अन्न के लिए पराश्रित नागरिकों के लिए एक विशुद्ध पातक है। इन दिनों जो जितनी संतान बढ़ा रहा है वह देश को उतना ही संकट में डाल रहा है। इस पाप से जिन्हें अनायास की छुट्टी मिल गई वे सचमुच सौभाग्यवान हैं। बच्चों के पालन-पोषण से लेकर उन्हें स्वावलम्बी बनाने तक की प्रक्रिया कितनी महॅंगी और कष्टसाध्य है इसे सब जानते हैं। जितना श्रम, मनोयोग एवं खर्च लडक़े के लिये करना पड़ता उतना ही यदि भगवान के लिये किया जाय तो निस्सन्देह इसी जन्म में भगवान मिल सकता है। वही अनुदान यदि परमार्थ प्रयोग के लिए लगाया जाय तो उतने से ही असंख्य लोगों को प्रेरणा देने वाली एक संस्था चल सकती है। आजकल के लडक़े बड़े होने पर अभिभावकों को केवल दु:ख ही देते हैं। अपने हाथों की कमाई भी किसी अच्छे काम के लिये खर्च करनी हो तो लडक़े उसे रोकते हैं, वे चाहते हैं हराम का सारा माल हमें ही मिले, यहॉं तक कि अपनी बहिनों को देता देखें तो भी कुढ़ते और विरोध करते हैं।

कोई यह चाहता हो कि लडक़े का बाप बनकर बुढ़ापे का आधार मिल जाएगा तो और भी दुराशा मात्र हैं। कुत्ता पराये घर रहकर जिसका कुछ प्रयोजन पूरा करता है उसी के यहॉं रोटी पा लेता है। इसी तरह मनुष्य के लिये यह सोचना कि बेटे बिना बुढ़ापा न कटेगा नितान्त मूर्खता हैं। सुख-सौभाग्य से भरा-पूरा मनुष्य भी एक कल्पित अभाव को गढक़र उस कारण कितना उद्विग्न होता है।

अगले दिनों जब मानव जाति के उत्थान-पतन का सूक्ष्म विवेचन किया जाएगा तब समीक्षकों और अन्वेषकों को एक स्वर में यही स्वीकार करना पड़ेगा कि विकृतियों और उलझनों के इस युग में समस्त विपत्तियों की जननी विकृत विचारधारा की अभिवृद्धि ही थी और उसे पलटने के लिए केवल मात्र एक ही प्रयोग द्वारा सुव्यवस्थित रूप से कार्य हुआ और उस प्रयोग का नाम था - युग निर्माण योजना द्वारा संचालित ज्ञान-यज्ञ ।

- पं श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (४.४)