ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
उस प्राण स्वरुप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
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Sunday, 8 April 2012

मनुष्य पर सूर्य का प्रभाव और उसका स्वरुप

विश्व रचना के दो प्रधान तत्व हैं - एक प्राण, (इसे  आध्यात्मिक भाषा में 'देव' भी कहते हैं), दूसरा 'भूत'। इन दोनो तत्वों का जहाँ भी मिलन हो जाता है, वहीँ दृश्य प्रकृति, गतिमान या क्रियाशील जीवन के दर्शन होने लगते हैं।केवल भूत पदार्थ प्राण के बिना स्पंदन नहीं कर सकता। इसीलिए भौतिक जगत में जहाँ भी जीवन तत्व है, वह प्राण ही है, इसे ही 'गायत्री' कहते हैं।

गायत्री का आविर्भाव कहाँ से हुआ? यह प्रश्न उठता है तो उपनिषदकार कहते हैं - "देवात्मा शक्तिम् स्वगुणे निर्गूढ़" (देव माया या इन्द्र शक्ति ही वह सत्ता है, जो विश्वगयात्री, अर्थात अनेक रूपों में विकसित होता है।) यह देव-शक्ति या इन्द्र कौन है - "तस्य दृश्यः शतादश" (सूर्य ही वह इन्द्र है, जिसकी हज़ारों किरणें हैं।) एक-एक किरण, एक-एक रूप है। इन किरणों में प्राण शक्ति भरी होती है। सूर्य को त्रयी विद्या भी कहा गया है अर्थात सूर्य स्वयं भी एक वैसी ही गायत्री है, जिस तरह की एक गायत्री शरीर, प्राण और मनोमय रूप में, धरती में विद्यमान् रहती है। इस तरह यदि सूर्य को एक विराट पुरुष की संज्ञा प्रदान करें - जो एक व्यापक क्षेत्र में बिलकुल मनुष्य की तरह क्रियाशील रहता है, सोच-विचार भी कर सकता है, विकल और क्षुब्ध हो सकता है, हर्ष और शोक, संतोष और असंतोष व्यक्त कर सकता है तो उसमे कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

मनुष्य एक छोटी गायत्री है, सूर्य एक विराट गायत्री।छोटी गायत्री को जब विराट गायत्री के साथ जोड़ देते हैं तो वह भी वैसी ही शक्ति और सम्पन्नता अनुभव करने लगती है जैसे धनवान पिता का पुत्र पास में कुछ न होने पर भी अपने पिता की तरह ही धन का अभिमान और कुछ भी क्रय कर सकने का विश्वास कर सकता है। अर्थात गायत्री के विराट स्वरुप को पा जाने पर मनुष्य भी उतनी ही क्षमता वाला हो सकता है, जितनी सूर्य भगवान की। इसे ही 'शक्ति' अथवा 'सिद्धि' कहते हैं।

सूर्य भगवान का दृश्य और क्रिया क्षेत्र बहुत व्यापक है। वह पृथ्वी ही नहीं, अनेक गृह-नक्षत्रों तक व्याप्त है। मनुष्य की शक्ति, उसकी आँखें ऐसी नहीं हैं की वह उतने व्यापक क्षेत्र को देख सके, किन्तु जब वह अपना सम्बन्ध सूर्यदेव के साथ जोड़ लेता है, (ध्यान-विज्ञान के द्वारा यह स्थिति काफी दिन में आ पाती है।) तो वह भी उसी तरह न केवल पृथ्वी की हलचलों और परिवर्तनों का जानकार हो जाता है, वरन् उसे ब्रह्मांडों के भी रहस्य ज्ञात होने लगते हैं, यही नहीं, वह एक अंश तक उन परिवर्तनों के साथ अपनी सम्मति भी जोड़ कर उन्हें कुछ कम या ज्यादा कर सकता है। अर्थात इस तरह के कोई आध्यात्मिक पुरुष बड़ी-बड़ी दैवी हलचलों का ज्ञान ही नहीं प्राप्त करते, उन्हें कम-ज्यादा या बिलकुल ही समाप्त भी कर सकते हैं।

गायत्री का मनुष्य जीवन में प्रादुर्भाव कैसे होता है? इस स्वरुप को व्यक्त करते हुए शास्त्रकार ने बताया की "मनः एव सविता" अर्थात मन ही सविता है। तात्पर्य यह है की जब मन और "सूर्यदेव" का तादात्म्य करते हैं (जप और सूर्यतेज मध्यस्था गायत्री का ध्यान करते हैं) तो मन प्राणवान होता है। अर्थात सूर्यदेव की भर्गशक्ति मनुष्य के अंतःकरण में प्रवेश करी है और प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करती है। अर्थात यदि प्रकृति कहीं दूषित हो रही है (कोई रोग के रूप में) तो उसे ठीक करती है। इसी का नाम असत् संस्कारों का निष्काषन और सत्संस्कारों का विकास होता है। जब तादाम्य की स्थिति ऐसी हो जाये की मन का ध्यान करते हुए मन की अग्नि और सूर्य रूप दोनों एक हो जायें, जब और विलय की कल्पना हो ही नहीं, तो उसे गायत्री सिद्धि कहेंगे। तब गायत्री की संपूर्ण अनुभूति और शक्ति का स्वामी वह मनुष्य होगा और उन क्षमताओं से, प्रकृति में उन परिवर्तनों की शक्ति से विभूषित होगा, जिनकी ऊपर व्याख्या की गई है।

शास्त्रकार ने कहा है की एक गायत्री मनुष्य है और दूसरी विद्या शक्ति सूर्य। दोनों में विलक्षण साम्य है, यह विषय अब विज्ञान भी सिद्ध करने लगा है। यह वह विद्या है, जो शरीर, बुद्धि और अंतःकरण तीनों में हस्तक्षेप रखने के कारण शरीर-बल, सांसारिक-बल और आत्म-बल देकर अपने उपासक का भारी हित सम्पादित कर सकती है, करती भी है।

- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
सावित्री कुण्डलिनी और तंत्र - पृष्ठ ३.१०७

Monday, 11 April 2011

विविध धर्म-सम्प्रदायों में गायत्री मंत्र का भाव सन्निहित है

१. हिन्दू - ईश्वर प्राणाधार, दुखनाशक तथा सुखस्वरूप है। हम प्रेरक देव के उत्तम तेज का ध्यान करें। जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर बढ़ाने के लिए पवित्र प्रेरणा दे।
(ऋग्वेद ३.६२.१०, यजुर्वेद ३६.३, सामवेद १४६२)
२. यहूदी - हे जेहोवा (परमेश्वर) अपने धर्म के मार्ग में मेरा पथ प्रदर्शन कर; मेरे आगे अपने सीधे मार्ग को दिखा। 
(पुराना नियम भजन संहिता ५.८)

३. शिन्तो - हे परमेश्वर, हमारे नेत्र भले ही अभद्र वस्तु देखें, परन्तु हमारे ह्रदय में अभद्र भाव उत्पन्न न हों। हमारे कान चाहे अपवित्र बातें सुनें, तो भी हमारे ह्रदय में अभद्र बातों का अनुभव न हो। 
(जापानी)

४. पारसी - वह परमगुरु (अहुरमज्द - परमेश्वर) अपने ऋत तथा सत्य के भण्डार के कारण, राजा के सामान महान है। ईश्वर के नाम पर किये गये परोपकार से मनुष्य प्रभु प्रेम का पात्र बनता है।
(अवेस्ता २७.१३)

५. दाओ (ताओ) - दाओ (ब्रह्म) चिंतन तथा पकड़ से परे है। केवल उसी के अनुसार आचरण ही उत्तम धर्म है।
(दाओ उपनिषद्)

६. जैन - अर्हन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार तथा सब साधुओं को नमस्कार।

७ बौद्ध धर्म - मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ, मैं धर्म की शरण में जाता हूँ, में संघ की शरण में जाता हूँ।
(दीक्षा मंत्र/त्रिशरण)

८. कनफ्यूशस - दूसरों के प्रति वैसा व्यवहार न करो, जैसा की तुम उनसे अपने प्रति नहीं चाहते।

९. ईसाई - हे पिता, हमें परीक्षा में न डाल; परन्तु बुराई से बचा; क्योंकि राज्य; पराक्रम तथा महिमा सदा तेरी ही है।
(नया नियम मत्ती ६.१३)

१०. इस्लाम - हे अल्लाह, हम तेरी ही वंदना करते तथा तुझी से सहायता चाहते हैं। हमें सीधा मार्ग दिखा; उन लोगों का मार्ग, जो तेरे कृपापात्र बने, न कि उनका, जो तेरे कोपभाजन बने तथा पथभ्रष्ट हुए।
(कुरान सूरा अल - फ़ातिहा)

११. सिख - ओंकार (ईश्वर) एक है। उसका नाम सत्य है। वह सृष्टिकर्ता, समर्थ पुरुष, निर्भय, निर्वैर, जन्मरहित तथा स्वयंभू है। वह गुरु कि कृपा से जाना जाता है।
(ग्रन्थ साहिब, जपुजी)

१२. बहाई - हे मेरे ईश्वर, मैं साक्षी देता हूँ कि तुझे पहचानने तथा तेरी ही पूजा करने के लिए तूने मुझे उत्पन्न किया हे। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई परमात्मा नहीं है। तो ही है भयानक संकटों से तारनहार तथा स्व निर्भर।
(निगूढ़ वचन)

 - शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार

Sunday, 10 April 2011

गायत्री ही युग शक्ति क्यों?

मनुष्य मात्र को जीवन लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ गुरुमंत्र - गायत्री महामंत्र

मनुष्य मात्र को उज्जवल भविष्य प्रदान करने में सक्षम गायत्री महाविद्या - सबके लिए सुलभ, सबके लिए साध्य, सबके लिए हितकर। इसे समझें, अपनाएँ, साधें और अनुपम लाभ उठायें।

ज्ञान (मार्गदर्शक बोध सूत्र)

१. ज्ञानपक्ष - गायत्री के ज्ञानपक्ष को उच्चस्तरीय तत्त्व ज्ञान की, ब्रह्मविद्या की, ऋतंभरा प्रज्ञा की संज्ञा दी जा सकती है। इसका उपयोग आस्थाओं और आकांशाओं को उच्चस्तरीय बनाने के लिए आवश्य क प्रशिक्षण के रूप में किया जा सकता है। ज्ञान-यज्ञ, विचारक्रांति आदि के बौद्धिक उत्कृष्टता के साधन इसी आधार पर जुटते हैं। लेखनी, वाणी एवं दृश्य-श्रव्य जैसे साधनों का उपयोग इसी निमित्त होता है। स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन-मनन की गतिविधियाँ इसी के निमित्त चलती हैं।

विज्ञान (दिव्यता प्रदायक श्रेष्ठ उपचार)

२. विज्ञान पक्ष - मानवी सत्ता के अंतराल में इतनी महान संभावनाएँ और क्षमताएँ प्रसुप्त स्थिति में भरी पड़ी हैं कि उन्हें प्रकारांतर से ब्रह्मचेतना की प्रतिकृति (ट्रू कापी) कहा जा सके। अंतराल की प्रसुप्ति ही दरिद्रता है और उसकी जागृति में सम्पन्नता का महासागर लहलहाता देखा जा सकता है। साधना विज्ञान के माध्यम से जो उसे जगाने, साधने और सदुपयोग करने में समर्थ हो सके, वे महान कहलाये, स्वयं धन्य बने हैं और अपने संपर्क क्षेत्र के जन-समुदाय एवं वातावरण को धन्य बनाया है।

युगशक्ति - परिवर्तन व्यक्ति के अंतराल का होना है। दृष्टिकोण बदला जाना है। आस्थाओं का परिष्कार किया जाना है और आकांशाओं का प्रवाह मोड़ना है। सदाशयता का पक्षधर मनोबल उभारना है। आत्मज्ञान प्राप्त करना और आत्म-गौरव जगाना है, यही है युग परिवर्तन का मुख्य आधार। आतंरिक परिष्कार की प्रक्रिया ही व्यक्ति की उत्कृष्टता और समाज की श्रेष्ठता के रूप में परिलक्षित होगी। सारा प्रयास-पुरुषार्थ अन्तर्जगत् से सम्बंधित है। इसलिए साधन भी उसी स्तर के होने चाहिए। सामर्थ्य ऐसी होनी चाहिए, जो अभीष्ट प्रयोजन को पूरा कर सकने के उपयुक्त सिध्द हो सके। निश्चित रूप से यह कार्य आत्मशक्ति का ही है। उत्पादन और उपयोग उसी का किया जाना है।युग निर्माण के लिए इसी उर्जा का उपार्जन आधारभूत काम समझा जा सकता है। ऐसा काम, जिसे करने की आवश्यकता ठीक इन्ही दिनों है। सर्वसमर्थ परमात्मा के छोटे घटक आत्मा की मूर्छना को जागृति में बदल देने की प्रक्रिया आध्यात्म-साधना के विभिन्न विधि-विधानों में गायत्री उपासना ही सर्वश्रेष्ठ और सर्वसुलभ मन गया है। आदिकाल से लेकर आज तक उस महाविज्ञान के सम्बन्ध में अनुभवों और प्रयोगों की विशालकाय शृंखला जुडती चली आई है। प्रत्येक शोध में उसकी नितनूतन विशेषताएँ उभरती चली आई हैं। प्रत्येक प्रयोग में उसके अभिनव शक्ति स्रोत प्रकट होते रहे हैं।

 - शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार

Tuesday, 22 March 2011

गायत्री साधना क्यों?

कई व्यक्ति सोचते हैं की हमारा उद्देश्य इश्वर प्राप्ति, आत्म-दर्शन और जीवन मुक्ति है। हमें गायत्री के, सूक्ष्म प्रकृति के चक्कर में पड़ने से क्या प्रयोजन है? हमें तो केवल ईश्वर आराधना करनी चाहिए। सोचने वालों को जानना चाहिए की ब्रह्म सर्वथा निर्विकार, निर्लेप, निरञ्जन, निराकार, गुणातीत है। वह न किसी से प्रेम करता है,  न द्वेष। वह केवल द्रष्टा एवं कारण रूप है। उस तक सीधी पहुँच नहीं हो सकती, क्योंकि जीव और ब्रह्म के बीच सूक्ष्म प्रकृति (एनेर्जी) का सघन आच्छादन है। इस आच्छादन को पार करने के लिए प्रकृति के साधनों से ही कार्य करना पड़ेगा। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, कल्पना, ध्यान, सूक्ष्म शरीर, षट्चक्र, इष्टदेव की ध्यान प्रतिमा, भक्ति, भावना, उपासना, व्रत, अनुष्ठान, साधना यह सभी तो माया निर्मित ही है। इन सभी को छोड़कर ब्रह्म प्राप्ति किस प्रकार होनी संभव है? जैसे ऊपर आकाश में पहुँचने के लिए वायुयान की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही ब्रह्म प्राप्ति के लिए भी प्रतिमूलक आराधना का आश्रय लेना पड़ता है। गायत्री के आचरण में होकर पार जाने पर ही ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। सच तो यह है कि साक्षात्कार का अनुभव गायत्री के गर्भ में ही होता है। इससे ऊपर पहुँचने पर सूक्ष्म इन्द्रियाँ और उनकी अनुभव शक्ति भी लुप्त हो जाती है। इसीलिए मुक्ति और ईश्वर प्राप्ति चाहने वाले भी 'गायत्री मिश्रित ब्रह्म' की, राधेश्याम, सीताराम, लक्ष्मीनारायण की ही उपासना करते हैं। निर्विकार ब्रह्म का सायुज्य तो तभी होगा, जब ब्रह्म 'बहुत से एक होने' कि इच्छा करेगा और सब आत्माओं को समेटकर अपने में धारण कर लेगा। उससे पूर्व सब आत्माओं का सविकार ब्रह्म में ही सामीप्य, सारुप्य, सायुज्य आदि हो सकता है। इस प्रकार गायत्री मिश्रित सविकार ब्रह्म ही हमारा उपास्य रह जाता है। उसकी प्राप्ति के साधन जो भी होंगे, वे सभी सूक्ष्म प्रकृति गायत्री द्वारा ही होंगे।

गायत्री वह दैवी शक्ति है जिससे सम्बन्ध स्थापित करके मनुष्य अपने जीवन विकास के मार्ग में बड़ी सहायता प्राप्त कर सकता है। परमात्मा की अनेक शक्तियाँ हैं, जिनके कार्य और गुण पृथक् पृथक् हैं। उन शक्तियों में गायत्री का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह मनुष्य को सद्बुद्धि की प्रेरणा देती है। गायत्री से आत्मसंबंध स्थापित करने वाले मनुष्य में निरंतर एक ऐसी सूक्ष्म एवं चैतन्य विद्युत् धारा संचरण करने लगती है, जो प्रधानतः मन, बुद्धि, चित्त और अंतःकरण पर अपना प्रभाव डालती है। बौद्धिक क्षेत्र के अनेकों कुविचारों, असत् संकल्पों, पतनोन्मुख दुर्गुणों का अन्धकार गायत्री रुपी दिव्य प्रकाश के उदय होने से हटने लगता है। यह प्रकाश जैसे-जैसे तीव्र होने लगता है, वैसे-वैसे अन्धकार का अंत भी उसी क्रम से होता जाता है।

मनोभूमि को सुव्यवस्थित, स्वस्थ, सतोगुणी एवं संतुलित बनाने में गायत्री का चमत्कारी लाभ असंदिग्ध है और यह भी स्पष्ट है कि जिसकी मनोभूमि जितने अंशों में सुविकसित है, वह उसी अनुपात में सुखी रहेगा, क्योंकि विचारों से कार्य होते हैं और कार्यों के परिणाम सुख-दुःख के रूप में सामने आते हैं। जिसके विचार उत्तम हैं, वह उत्तम कार्य करेगा, जिसके कार्य उत्तम होंगे, उसके चरणों तले सुख-शांति लोटती रहेगी।

गायत्री उपासना द्वारा साधकों को बड़े-बड़े लाभ प्राप्त होते हैं। हमारे परामर्श एवं पथ-प्रदर्शन में अब तक अनेकों व्यक्तियों ने गायत्री उपासना की है। उन्हें सांसारिक और आत्मिक जो आश्चर्यजनक लाभ हुए हैं, हमने अपनी आँखों से देखे हैं। इसका कारण यही है कि उन्हें दैवी वरदान के रूप में सदबुद्धि प्राप्त होती है और उसके प्रकाश में उन सब दुर्बलताओं, उलझनों, कठिनाइयों का हल निकल आता है, जो मनुष्य को दीन-हीन, दुःखी, दरिद्र, चिंतातुर, कुमार्गगामी बनती हैं। जैसे प्रकाश का न होना अन्धकार है, जैसे अन्धकार स्वतंत्र रूप से कोई वस्तु नहीं है; इसी प्रकार सद्ज्ञान का न होना ही दुःख है, उसकी रचना भी वैसे ही है। केवल मनुष्य अपनी आतंरिक दुर्बलता के कारण, सद्ज्ञान के अभाव के कारण दुःखी रहता है, अन्यथा सुर दुर्लभ मानव शरीर "स्वर्गादपि गरीयसी" धरती माता पर दुःख का कोई कारण नहीं, यहाँ सर्वत्र, सर्वथा आनंद ही आनंद है।

सद्ज्ञान की उपासना का नाम ही गायत्री उपासना है। जो इस साधना के साधक हैं, उन्हें आत्मिक एवं सांसारिक सुखों की कमी नहीं रहती, ऐसा हमारा सुनिश्चित विश्वास और दीर्घकालीन अनुभव है।
 - पं श्रीराम शर्मा आचार्य