ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
उस प्राण स्वरुप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

Wednesday, 30 March 2011

असंख्य समस्याओं का एकमात्र हल - विचार-क्रान्ति

दुर्भाग्य को क्या कहा जाय जिसने हमारी विचार प्रणाली में विष घोल दिया और हम हर बात को उलटे ढंग से सोचने लगे। इस उल्टी बुद्धि का एक छोटा-सा नमूना देखा जाय। कई लोगों में सन्तान या लडक़ा नहीं होता। वस्तुत: यह लोग बहुत ही सुखी और सौभाग्यशाली हैं। बढ़ती हुई आबादी में और बढ़ोत्तरी करना - अन्न के लिए पराश्रित नागरिकों के लिए एक विशुद्ध पातक है। इन दिनों जो जितनी संतान बढ़ा रहा है वह देश को उतना ही संकट में डाल रहा है। इस पाप से जिन्हें अनायास की छुट्टी मिल गई वे सचमुच सौभाग्यवान हैं। बच्चों के पालन-पोषण से लेकर उन्हें स्वावलम्बी बनाने तक की प्रक्रिया कितनी महॅंगी और कष्टसाध्य है इसे सब जानते हैं। जितना श्रम, मनोयोग एवं खर्च लडक़े के लिये करना पड़ता उतना ही यदि भगवान के लिये किया जाय तो निस्सन्देह इसी जन्म में भगवान मिल सकता है। वही अनुदान यदि परमार्थ प्रयोग के लिए लगाया जाय तो उतने से ही असंख्य लोगों को प्रेरणा देने वाली एक संस्था चल सकती है। आजकल के लडक़े बड़े होने पर अभिभावकों को केवल दु:ख ही देते हैं। अपने हाथों की कमाई भी किसी अच्छे काम के लिये खर्च करनी हो तो लडक़े उसे रोकते हैं, वे चाहते हैं हराम का सारा माल हमें ही मिले, यहॉं तक कि अपनी बहिनों को देता देखें तो भी कुढ़ते और विरोध करते हैं।

कोई यह चाहता हो कि लडक़े का बाप बनकर बुढ़ापे का आधार मिल जाएगा तो और भी दुराशा मात्र हैं। कुत्ता पराये घर रहकर जिसका कुछ प्रयोजन पूरा करता है उसी के यहॉं रोटी पा लेता है। इसी तरह मनुष्य के लिये यह सोचना कि बेटे बिना बुढ़ापा न कटेगा नितान्त मूर्खता हैं। सुख-सौभाग्य से भरा-पूरा मनुष्य भी एक कल्पित अभाव को गढक़र उस कारण कितना उद्विग्न होता है।

अगले दिनों जब मानव जाति के उत्थान-पतन का सूक्ष्म विवेचन किया जाएगा तब समीक्षकों और अन्वेषकों को एक स्वर में यही स्वीकार करना पड़ेगा कि विकृतियों और उलझनों के इस युग में समस्त विपत्तियों की जननी विकृत विचारधारा की अभिवृद्धि ही थी और उसे पलटने के लिए केवल मात्र एक ही प्रयोग द्वारा सुव्यवस्थित रूप से कार्य हुआ और उस प्रयोग का नाम था - युग निर्माण योजना द्वारा संचालित ज्ञान-यज्ञ ।

- पं श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (४.४)

Sunday, 27 March 2011

चारों और से एक ही पुकार - बदलाव, बदलाव!

सौभाग्यशाली हम

इन दिनों चारों और परिवर्तन की बयार बह रही है। जिनकी आँखों पर पर्दा हो, धुंधलका छाया हो, वे संभवतः समय की इस विषमता को पहचान न पाएँ। जिनके चिंतन पर नकारात्मकता ही छाई हो, वे संभवतः यही कहें की कुछ नहीं होने वाला, दुनिया तो ऐसे ही चलती है, चलती रहेगी। थोड़ी उठापटक होकर रह जाएगी, कुछ नहीं बदलने वाला, पर जो दिव्यदर्शी हैं, जिन्हें भगवान की कृपा से समझदारी मिली है, जो परिवर्तनों द्वारा भविष्य का आंकलन कर पाते हैं, ऐसों को स्पष्ट दिखाई दे रहा है की २०११ से विश्वव्यापी परिवर्तनों की शृंखला आरम्भ होने जा रही है। चारों और से एक ही आवाज आने वाली है - परिवर्तन, बदलाव, बदलाव! अब इसे कोई रोक नहीं पायेगा। युग परिवर्तन का शुभारम्भ हो चुका है एवं यह आगामी दस वर्षों में पूरी तरह स्पष्ट दिखाई देने लगेगा। सौभाग्य की बात यह कि इस सब उठापटक की - वैचारिक परिवर्तन की धुरी हमारा प्यारा भारतवर्ष बनेगा।

एक महत्वपूर्ण भविष्यवाणी

श्री अरविन्द एवं स्वामी विवेकानंद ने अलग-अलग समय में एक भविष्यवाणी की थी, जो आज की इन घड़ियों पर लागू होती है। दोनों ने कहा कि ठाकुर श्री रामकृष्णदेव के जन्म (१८३६) के साथ ही युग परिवर्तन की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है, पर इसकी पराकाष्ठा वाला स्वरुप १७५ वर्ष बाद ही दृष्टीगोचर होगा। इतना समय संधिकाल का है। खेत में निराई-गुड़ाई होती है, बीज डालते हैं, पर अगले ही दिन फसल नहीं आ जाती। वह अपना समय लेती है। हर बड़ा परिवर्तन समय मांगता है। मौसम को ही ले लें। नवरात्री काल की प्रसवपीड़ा भरी अवधि से गुजरे बिना गर्मी की तपन शांत होकर ठंढक का एहसास नहीं होता। इसी तरह वसंत की पराकाष्ठा हेमंत की ठिठुरन को समाप्त कर चैत्र नवरात्र में गर्मी के आगमन के रूप में दिखाई देती है। कविश्रेष्ठ कालिदास नें भारत को षडऋतुओं वाला अद्वितीय देश माना है एवं प्रकृति के सौंदर्य का बड़ा विलक्षण वर्णन किया है। जो ऋतु-परिवर्तन के इस चक्र को समझते हैं, वे जानते हैं की बदलाव ही प्रकृति का धर्म है - जो आज है वह कल नहीं रहेगा, बदलकर रहेगा।

दोनों महापुरुषों के अनुसार हम १७५ वर्ष की वेदना भरी, प्रसव पीड़ा समान, संक्रांतिकाल की अवधि पार कर अब सतयुग की वापसी की ओर बढ़ रहे हैं और यह समय, कितना विलक्षण संयोग है की २०११ से हमारी आराध्य सत्ता परमपूज्य गुरुदेव के जन्म शताब्दी वर्ष की वेला में आया है। २०११ में परम पूज्य गुरुदेव के जन्म के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं तथा अब तेजी से चारों ओर हर क्षेत्र में बदलाव का क्रम और भी प्रखरता से होता दीखना शुरू हो रहा है। हम स्वयं देखें, एक विश्लेषण करें, तो पाते हैं की विगत सौ वर्षों में कई असंभव से दीख पड़ने वाले कार्य किस तरह से संपन्न होते चले गए। एक-एक करके उनका जिक्र करते हैं। आपको स्वयं स्पष्ट होता चला जायेगा।

धूल-धूसरित हुए राजमुकुट भी

सौ वर्ष पहले भारत गुलाम था; भारत ही नहीं अगणित राष्ट्र परतंत्रता में जी रहे थे। लगता ही नहीं था की हम कभी आजाद होंगे। एक हवा तेजी से बही। पहले १८५७ की क्रांति का समय आया और उसके ५० वर्ष बाद न जाने कहाँ से गोखले, तिलक, गाँधी, सुभाष, भगतसिंह जन्म लेते और भारत को आजादी दिलाते चले गए। वातावरण बनाने में महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद एवं रमण महर्षि ने अपनी भूमिकाएँ निभाईं; वह अलग है। चारों और राजे-रजवाड़े थे - एक नहीं अगणित। सामंतशाही, जमींदारी, सहकारी के प्रचालन देखते-देखते समाप्त हो गए। राजमुकुट धूल-धूसरित होते चले गए। दास-दासियों की व्यवस्था थी। क्रांति अमेरिका में भी चली और अन्य देशों में भी। देखते-देखते उन्हें बेचने-खरीदने का प्रचलन समाप्त हो गया। सैकड़ों रखैल रखने वाले 'हरम' अब कहाँ हैं!

महाक्रान्ति की शृंखला

सतीप्रथा कभी इस देश पर कलंक बनी हुई थी। उसे धार्मिकता का बाना और पहना दिया गया था। राजा राममोहन राय जैसे महापुरुष आये और विधवा विवाह भी एक सच्चाई बन गयी। छूत-अछूत के बीच भेदभाव कितना जबरदस्त था। अभी कुछ दशक पहले तक भी एक अछूत-दलित को दबंग के घर के सामने बारात निकालने, उनके कुएँ से पानी पीने की मनाही थी। क्रांति का प्रवाह चला और देखते-देखते समता की धारा बहने लगी। छिटपुट प्रकरण आज भी होते हैं, पर यह कहने से कोई भी नहीं रोक सकता की आज सबको सामान अवसर प्राप्त हैं। हर वर्ग का व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है। 'आरक्षण' शब्द का भले ही दुरुपयोग हुआ है, पर उसने सभी को समान अवसर प्रदान किए हैं। प्रतिभा है तो कोई जातिवाद के नाम पर दबा नहीं रह सकता। उसे पूरे अवसर मिलेंगे। यह बात आज से सौ वर्ष पूर्व सोची भी नहीं जा सकती थी।

नारी जागरण
परिवर्तन की यह शृंखला कहाँ तक गिनाएँ। नारीशक्ति को आज जो अधिकार प्राप्त हैं, यह उसके संघर्ष का तो परिणाम है ही, उस बदलाव की परोक्ष हवा के कारण भी है, जो सारे विश्व में बह रही है। जहाँ उसे दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता था, वहाँ आज बड़े-बड़े पदों पर सुशोभित है। पति-पत्नी, दोनों सामान अधिकार प्राप्त, कंधे से कंधा मिलाकर कार्य कर रहे हैं। पढ़ाई के अवसर दोनों को ही प्राप्त हैं। कभी दोनों में भेद माना जाता था। आज लड़की होना सौभाग्य का चिन्ह माना जाता है। नारी स्वयं अपनी अवमानना करे तो बात अलग है, पर समय ने उसे जहाँ लाकर खड़ा कर दिया है, वहाँ उसका उत्कर्ष ही उत्कर्ष दिखाई देता है। साक्षरता, स्वावलंबन, नेतृत्व, सैन्य बल, सुरक्षा, चिकित्सा, हर क्षेत्र में आज नारी नर से आगे ही है और यह एक महापरिवर्तन से कम नहीं है।

जन-जन को अधिकार

पंचायती राज की स्थापना, सहकारिता आन्दोलन आदि ने देखते-देखते जन-जन को अधिकार दे दिया है। कोई किसी तरह की शिकायत नहीं कर सकता। भारत में राईट टू एजुकेशन (आर. टी. आई.) एवं सूचना का अधिकार (आर. टी. आई.) ने एक क्रांति ही कर दी है। अब कोई भी चीज, सूचना गोपनीय नहीं रह सकती। जनहित में उसे जाहिर करना ही होगा। हमारी न्याय व्यवस्था ने बड़ी ईमानदारी से लोकतंत्र के एक सशक्त प्रहरी - मानीटर की भूमिका निभाई है। सबके लिए न्यायलय का द्वार खुला है। लोकहित याचिका दायर कर आप प्रमाणों के साथ किसी भी अपराधी को खुला-छुट्टा घूमने से रोक सकते हैं। यह बात अलग है कि अभी भी आजादी के बाद हम ६४ वर्ष बाद भी ब्रिटिश क़ानून को ही ढो रहे हैं, इसीलिए कई कमियाँ हैं, पर समयानुसार यह भी व्यवस्थित होगा एवं आगामी दशक इसका साक्षी बनेगा। हमारी 'जुडीशीयरी' कि पारदर्शिता पूरे विश्व में एक अलग मिसाल बनी है।

नहीं बचेगा अधिनायकवाद

आन्दोलन पूरे विश्व को प्रभावित कर रहे हैं। अधिनायकवाद आज से सौ वर्ष पूर्व तीन-चौथाई विश्व पर छाया था। सोवियत रूस, चीन उससे मुक्त हुए और देखते-देखते आधी आबादी खुलेपन कि श्वास से जीने लगी। चीन के तियानामन चौक की क्रांति ने चीन को बदल कर रख दिया तो १९८९ में टूटी बर्लिन की दीवार ने यूरोप व रूस का नक्शा ही बदल दिया। अभी पिछले दिनों इजिप्ट, ट्यूनीशिया, यमन, जोर्डन जैसे देशों में जो आजादी के आन्दोलन चले हैं, वे इसी महापरिवर्तन प्रक्रिया के अंग हैं। कहीं भी, किसी को भी अब दबाकर नहीं रखा जा सकता। उसे मुक्त होना ही पड़ेगा, यह समय की मांग है एवं उसे हर किसी को स्वीकार करना ही पड़ेगा, मन से या बेमन से। यह स्पष्ट होता जा रहा है।

संचार की क्रांति

कम्युनिकेशन के क्षेत्र में हुई क्रांति ने पूरे विश्व को एक ग्लोबल ग्राम बना दिया है। इन्टरनेट, मोबाइल, ट्वीटर, फेसबुक आदि ने वह काम कर दिखाया है, जो कोई एक व्यक्ति नहीं कर सकता था। सारे विश्व को एक भाषा में - एक जाल में  - वर्ल्ड वाइड वेब में पिरोने का कार्य इतनी तेजी से विगत पच्चीस वर्षों में हुआ है कि इसे देख कर बदलाव की गति पर हैरानी होती है। आज इन्टरनेट जन-जन की भाषा है। उस पर नेटकास्ट हो रहा है। कोई भी किसी को दबाकर नहीं रख सकता। सच्चाई जन-जन तक पहुँच कर ही चैन ले रही है। तानाशाही मनोवृत्ति वाले शासक भी उस पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं। इसके साथ मीडिया की क्रांति ने जन-जन को एकदूसरे से जोड़ दिया है। १९८० तक भी हम उस दुनिया की कल्पना नहीं कर सकते थे, जो की आयपौड, आयपैड, मोबाइल, टी.वी. की दुनिया है। विज्ञान के इन अविष्कारों ने हर सूचना हर व्यक्ति तक पहुँचाने का जिम्मा लिया है।


नेतृत्व लेगा वैज्ञानिक आध्यात्म

क्रांति से धर्मतंत्र भी अछूता नहीं रहा है। प्रगतिशील आध्यात्म ही अब स्वीकार्य है। चाहे वह पोप की आवाज हो या भारत के धर्मदिग्गजों की, हर कोई अब जनता की पारदर्शी निगाहों के सामने है। कभी मठाधीश भी पोप की तरह, जमींदारों की तरह जीते थे, अब परिवर्तन की आंधी में सभी धन-संग्रह कर भोग-विलास में जीने की सोच भी नहीं सकते। उन्हें विवश हो कर लोकसेवा के आराधना के कार्यों में स्वयं को नियोजित करना पड़ रहा है। यह बदलाव इतनी तेजी से हो रहा है व आगामी एक दशक में इतनी तीव्रगति पकड़ेगा कि कल्पनातीत होगा। धर्म का अब वैज्ञानिक स्वरुप होने जा रहा है। वैज्ञानिक आध्यात्मवाद ही जन-जन की भाषा बनने जा रहा है; यह एक वास्तविकता है।

भ्रष्टाचार पर लगाम

बदलाव के अपने कई पहलू हैं - नकारात्मक भी। वैश्वीकरण की आंधी में भोगवाद भी बढ़ा, भ्रष्टाचार भी बढ़ा, प्रत्यक्षवाद ने आदमी को लालची भी बनाया और अपराधी भी, पर अब कोई यह सोचे कि ये सब जिन्दा रहेंगे, कालाधन ही जियेगा और संग्रह कि प्रवृत्ति पर कोई अंकुश नहीं रख पाएगा तो यह एक भवितव्यता मानी जानी चाहिए कि इन सब पर अब तेजी से नियंत्रण होने जा रहा है। पिछले दिनों भारतवर्ष सहित पूरे विश्व के पचास से अधिक देशों में हुए परिवर्तन बताते हैं कि असली सम्राट जनशक्ति है और अब कुछ भी छिपा नहीं रह सकता, चाहे वह स्विस बैंकों में छिपा धन ही क्यों न हो। आध्यात्मवाद तेजी से बढ़ता जा रहा है एवं हर व्यक्ति उसे स्वीकार करे, ऐसा वातावरण बनने जा रहा है। विज्ञान के उत्कर्ष कि बुराइयों को तेजी से नकारा जायेगा, छोटे-बड़े युद्धों कि संभावनाएँ निरस्त होंगी एवं मानव मात्र के लिए जीने, जन-जन के हित की योजनाओं को बनाने, लागू करने में ही शक्ति नियोजित होगी। स्वराज सही अर्थों में यही होगा।

हमारा यह दृढ़ विश्वास

गायत्री परिवार का अपनी संस्थापक सत्ता - आराध्य सत्ता की इस जन्म शताब्दी की वेला में ऐसा मानना है की युग-परिवर्तन की प्रक्रिया-महापरिवर्तनों की वेला - इक्कीसवीं सदी आ गयी है। २०११ से यह कार्य और भी तीव्र गति से चलेगा, गेयर बदलकर आगे बढ़ेगा और किसी के रोके नहीं रुकेगा। क्रांतियाँ तेजी से होंगी। सूक्ष्मजगत की विधि-व्यवस्था इन दिनों हिमालय की ऋषिसत्ताओं के हाथ में है। वे ही इन महापरिवर्तनों की व्यवस्था का संचालन कर रहे हैं। हमें तो निमित्तमात्र बनकर साथ भर चलना है। लक्ष्य एक ही है - मानव में देवत्व का उदय। इसी से धरती पर सतयुग आएगा एवं इसका प्रमाण मिल रहा है उषाकाल-प्रभातपर्व की इस वेला में उस अरुणोदय से, जो स्पष्ट दिखाई दे रहा है। किसी को भी इसमें संशय नहीं होना चाहिए। कहीं आप असमंजस में तो नहीं? यह समय बदलने का है। बदल जाइये

 - (अखंड ज्योति, मार्च २०११. पृष्ठ ५ - ७)

Tuesday, 22 March 2011

गायत्री साधना क्यों?

कई व्यक्ति सोचते हैं की हमारा उद्देश्य इश्वर प्राप्ति, आत्म-दर्शन और जीवन मुक्ति है। हमें गायत्री के, सूक्ष्म प्रकृति के चक्कर में पड़ने से क्या प्रयोजन है? हमें तो केवल ईश्वर आराधना करनी चाहिए। सोचने वालों को जानना चाहिए की ब्रह्म सर्वथा निर्विकार, निर्लेप, निरञ्जन, निराकार, गुणातीत है। वह न किसी से प्रेम करता है,  न द्वेष। वह केवल द्रष्टा एवं कारण रूप है। उस तक सीधी पहुँच नहीं हो सकती, क्योंकि जीव और ब्रह्म के बीच सूक्ष्म प्रकृति (एनेर्जी) का सघन आच्छादन है। इस आच्छादन को पार करने के लिए प्रकृति के साधनों से ही कार्य करना पड़ेगा। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, कल्पना, ध्यान, सूक्ष्म शरीर, षट्चक्र, इष्टदेव की ध्यान प्रतिमा, भक्ति, भावना, उपासना, व्रत, अनुष्ठान, साधना यह सभी तो माया निर्मित ही है। इन सभी को छोड़कर ब्रह्म प्राप्ति किस प्रकार होनी संभव है? जैसे ऊपर आकाश में पहुँचने के लिए वायुयान की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही ब्रह्म प्राप्ति के लिए भी प्रतिमूलक आराधना का आश्रय लेना पड़ता है। गायत्री के आचरण में होकर पार जाने पर ही ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। सच तो यह है कि साक्षात्कार का अनुभव गायत्री के गर्भ में ही होता है। इससे ऊपर पहुँचने पर सूक्ष्म इन्द्रियाँ और उनकी अनुभव शक्ति भी लुप्त हो जाती है। इसीलिए मुक्ति और ईश्वर प्राप्ति चाहने वाले भी 'गायत्री मिश्रित ब्रह्म' की, राधेश्याम, सीताराम, लक्ष्मीनारायण की ही उपासना करते हैं। निर्विकार ब्रह्म का सायुज्य तो तभी होगा, जब ब्रह्म 'बहुत से एक होने' कि इच्छा करेगा और सब आत्माओं को समेटकर अपने में धारण कर लेगा। उससे पूर्व सब आत्माओं का सविकार ब्रह्म में ही सामीप्य, सारुप्य, सायुज्य आदि हो सकता है। इस प्रकार गायत्री मिश्रित सविकार ब्रह्म ही हमारा उपास्य रह जाता है। उसकी प्राप्ति के साधन जो भी होंगे, वे सभी सूक्ष्म प्रकृति गायत्री द्वारा ही होंगे।

गायत्री वह दैवी शक्ति है जिससे सम्बन्ध स्थापित करके मनुष्य अपने जीवन विकास के मार्ग में बड़ी सहायता प्राप्त कर सकता है। परमात्मा की अनेक शक्तियाँ हैं, जिनके कार्य और गुण पृथक् पृथक् हैं। उन शक्तियों में गायत्री का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह मनुष्य को सद्बुद्धि की प्रेरणा देती है। गायत्री से आत्मसंबंध स्थापित करने वाले मनुष्य में निरंतर एक ऐसी सूक्ष्म एवं चैतन्य विद्युत् धारा संचरण करने लगती है, जो प्रधानतः मन, बुद्धि, चित्त और अंतःकरण पर अपना प्रभाव डालती है। बौद्धिक क्षेत्र के अनेकों कुविचारों, असत् संकल्पों, पतनोन्मुख दुर्गुणों का अन्धकार गायत्री रुपी दिव्य प्रकाश के उदय होने से हटने लगता है। यह प्रकाश जैसे-जैसे तीव्र होने लगता है, वैसे-वैसे अन्धकार का अंत भी उसी क्रम से होता जाता है।

मनोभूमि को सुव्यवस्थित, स्वस्थ, सतोगुणी एवं संतुलित बनाने में गायत्री का चमत्कारी लाभ असंदिग्ध है और यह भी स्पष्ट है कि जिसकी मनोभूमि जितने अंशों में सुविकसित है, वह उसी अनुपात में सुखी रहेगा, क्योंकि विचारों से कार्य होते हैं और कार्यों के परिणाम सुख-दुःख के रूप में सामने आते हैं। जिसके विचार उत्तम हैं, वह उत्तम कार्य करेगा, जिसके कार्य उत्तम होंगे, उसके चरणों तले सुख-शांति लोटती रहेगी।

गायत्री उपासना द्वारा साधकों को बड़े-बड़े लाभ प्राप्त होते हैं। हमारे परामर्श एवं पथ-प्रदर्शन में अब तक अनेकों व्यक्तियों ने गायत्री उपासना की है। उन्हें सांसारिक और आत्मिक जो आश्चर्यजनक लाभ हुए हैं, हमने अपनी आँखों से देखे हैं। इसका कारण यही है कि उन्हें दैवी वरदान के रूप में सदबुद्धि प्राप्त होती है और उसके प्रकाश में उन सब दुर्बलताओं, उलझनों, कठिनाइयों का हल निकल आता है, जो मनुष्य को दीन-हीन, दुःखी, दरिद्र, चिंतातुर, कुमार्गगामी बनती हैं। जैसे प्रकाश का न होना अन्धकार है, जैसे अन्धकार स्वतंत्र रूप से कोई वस्तु नहीं है; इसी प्रकार सद्ज्ञान का न होना ही दुःख है, उसकी रचना भी वैसे ही है। केवल मनुष्य अपनी आतंरिक दुर्बलता के कारण, सद्ज्ञान के अभाव के कारण दुःखी रहता है, अन्यथा सुर दुर्लभ मानव शरीर "स्वर्गादपि गरीयसी" धरती माता पर दुःख का कोई कारण नहीं, यहाँ सर्वत्र, सर्वथा आनंद ही आनंद है।

सद्ज्ञान की उपासना का नाम ही गायत्री उपासना है। जो इस साधना के साधक हैं, उन्हें आत्मिक एवं सांसारिक सुखों की कमी नहीं रहती, ऐसा हमारा सुनिश्चित विश्वास और दीर्घकालीन अनुभव है।
 - पं श्रीराम शर्मा आचार्य

Sunday, 20 March 2011

धैर्य

साधक का पहला लक्षण है - धैर्य! धैर्य की रक्षा ही भक्ति की परीक्षा है। जो अधीर हो गया, सो असफल हुआ। लोभ और भय के, निराशा और आवेश के जो अवसर साधक के सामने आते हैं, उनमें और कुछ नहीं, केवल धैर्य परखा जाता है। सदा प्रसन्न रहो। मुसीबतों का खिले चेहरे से सामना करो। आत्मा सबसे बलवान है, इस सच्चाई पर दृढ़ विश्वास रखो। यही ईश्वरीय विश्वास है। इस विश्वास द्वारा आप समस्त कठिनाइयों पर विजय पा सकते हैं।

 - पं श्रीराम शर्मा आचार्य

युग परिवर्तन की वेला में पालन करने योग्य पंचशील

(१.) अपना एक संसार बसाइए और अलग रहिये; अलग अर्थात भौतिकता से हटकर।
(२.) अपनी इच्छाओं को मन कडा करके बदल डालिए।
(३.) कर्मयोगी की तरह से जियें।
(४.) जो चीजें पास हैं, उनका ठीक से इस्तेमाल करें, यथा - समय, श्रम, इन्द्रियां।
(५.) जो पास है, उसे अकेले न खाएँ, सारे समाज को बांटकर प्रयोग करें। यज्ञीय जीवन की वृत्ति विकसित करें।


 - पं श्रीराम शर्मा आचार्य

Monday, 14 March 2011

मैं व्यक्ति नहीं विचार हूँ

यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि पारमार्थिक कार्यों में निरन्तर प्रेरणा देने वाली आत्मिक स्थिति जिनकी बन गई होगी, वे ही युग-निर्माण जैसे महान कार्य के लिए देर तक धैर्यपूर्वक कुछ कर सकने वाले होंगे। ऐसे ही लोगों के द्वारा ठोस कार्यों की आशा की जा सकती है। गायत्री आन्दोलन में केवल भाषण सुनकर या यज्ञ- प्रदर्शन देखकर जो लोग शामिल हुए थे, वे देर तक अपनी माला साधे न रह सके, पर जिन लोगों ने गायत्री साहित्य पढक़र, विचार मंथन के बाद इस मार्ग पर कदम बढ़ाया था, वे पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं। युग-निर्माण कार्य के लिए हम उत्तेजनात्मक वातावरण में अपरिपक्व लोगों को साथ लेकर बालू के महल जैसा कच्चा आधार खड़ा नहीं करना चाहते।

इसलिए इस संघ में उन्हीं लोगों पर आशा भरी नजर डाली जाएगी जो बात को गहराई तक समझ  चुके हैं, उसकी जड़ तक जा चुके हैं। वरना आधे-सीधे लोगों का भानुमती का कुनबा इकट्ठा करके कोई संगठन बना लिया जाए, तो वह ठहरता कहाँ है? गायत्री परिवार की कितनी  ही शाखाएँ इसी प्रकार ठप्प हुईं। अब उस गलती को दुबारा नहीं दुहराना चाहिए। जिन लोगों की दृष्टि में विचारों का कोई मूल्य या महत्त्व नहीं, वे किसी कार्य में देर तक कब ठहरने वाले हैं ? जो लोग अखण्ड-ज्योति नहीं मँगा सके, जो गायत्री साहित्य नहीं पढ़ सके, वे किसी समय बड़े भारी श्रद्धावान दीखने वाले साधक भी आज सब कुछ छोड़े बैठे दीखते हैं। प्रेरणा का सूत्र टूट गया, अपना निज का कोई गहरा स्तर था नहीं, फिर उनके पैर भौतिक बाधाओं के झकझोरे में कब तक टिके रहते?

इसीलिए हम यह बारीकि से देखते रहते हैं कि सामने बैठा हुआ, लम्बी-चौड़ी  बातें बनाने वाला व्यक्ति हमारी विचारधारा के साथ अखण्ड-ज्योति या साहित्य के माध्यम से बँधा है या नहीं? यदि वह इस की उपेक्षा करता है तो हम समझ लेते हैं कि यह देर तक टिकने वाला नहीं है। जो हमारे विचारों को प्यार नहीं करते, उनका मूल्य नहीं समझते वे शिष्ठाचार में मीठे शब्द भले ही कहें, गुरुजी-गुरुजी, वस्तुत: वे हमसे हजारों मील दूर हैं, उनसे किसी बड़े काम की कोई आशा नहीं रखी जा सकती।

  - पं श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (२.५०)

Sunday, 13 March 2011

नारी की क्षमता विकसित होने दी जाए

शताब्दियों से नर ने नारी का, पत्नी, पुत्री और माता का रिश्ता होते हुए भी बेतरह शोषण किया है। एक ओर उसे जेवर-कपड़े से सजाता रहा और गीत-वाद्यों में उसके रूप, यौवन की सराहना करने में अतिशयोक्ति का अन्त करता रहा। दूसरी ओर उसे पददलित, पराधीन और अपंग बनाने में भी कोई कमी न रखी, जिस तरह बेईमान दुकानदार लेने के बाँट अलग और देने के अलग रखकर बेईमानी पर पर्दा डाले रहता है।

पिछले दिनों जो किया गया है, उसका प्रायश्चित करके ही नर अपनी कलंक कालिमा धो सकता है। भूल सुधार की मॉंग है कि नारी पर से पाशविक प्रतिबंध अविलम्ब हटाये जाएँ, उसे पर्दा प्रथा से मुक्त किया जाए। प्रायश्चित की मॉंग है कि नारी का पिछड़ापन दूर करने के लिए नर न्यायानुकूल से बढक़र उसकी कुछ अतिरिक्त सहायता करे। बीमारी से छूटने पर दुर्बल व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ कराने के लिए उसके घर वाले कुछ अतिरिक्त पौष्टिक आहार आदि की सुविधाएँ देते हैं, उसी प्रकार, नर के अन्दर यदि आत्मा मौजूद हो तो उसे उसी के अन्याय से दुर्बल नारी को समर्थ, स्वावलम्बी बनाने के लिए कुछ अतिरिक्त सहायता देनी चाहिए। यह सहायता भोजन-वस्त्र के रूप में नहीं, बन्धनों से थोड़े अवकाश के रूप में दी जाए। उसे सार्वजनिक सेवा के क्षेत्र में प्रवेश करने दिया जाए । घर से बाहर निकालने में जो हजार शंका-कुशंकाएँ की जाती हैं, उस ओछेपन से अपने को विरत कर लिया जाय।

इन दिनों नारी के सामने समाज सेवा का कोई स्पष्ट चित्र, रूप या कार्यक्षेत्र नहीं है, इसलिए इच्छा होते हुए भी कुछ कर नहीं पाती। शिक्षा पर्याप्त हो गई। विवाह का योग नहीं बना। खाली समय काटना अखरा। बस वह अध्यापिका जैसी कोई नौकरी कर लेती है और फिर कुछ कमाने का चस्का पड़ जाने से तथा एक ढर्ऱा पड़ जाने से वह उसी क्रम को अन्त तक अपनाये रहती है। शिक्षा का यह कोई श्रेष्ट सदुपयोग नहीं है। जिनके घर में पैसे की तंगी है, वे नौकरी करें तो बात समझ में आती है। फिर जिन्हें इस प्रकार की कोई विवशता नहीं है, गुजारे में कठिनाई नहीं है, उन्हें नौकरी की ओर नहीं, नारी सेवा जैसे जीवन को धन्य बनाने वाले महान कार्य की ओर आकर्षित होना चाहिए। यदि ऐसा किया जा सके तो विश्व को चकाचौंध कर देने वाले अगणित नारी रत्न अपने देश में अनायास ही पैदा हो जाएगें।

 - पं श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (१.६४)